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शिशिर (नवगीत पर एक प्रयास)

शीत जैसे जम गयी,

नम धूप लगती है।

 

ठिठुरते रात भर

सार में सारे ही पशु

भोर कि शाला में

ठिठुरते सारे ही शिशु,

फिजां रंगीन दिखे

मन रूप लगती है।

 

द्वार बंद है शाम से बंद

खिडकी और झरोखे,

द्वार पर होती हो दस्तक

कम हैं ऐसे भी मौके,

करें तंग दरारें,गुजरती

हवा खूब लगती है। 

 

उपरोक्त  रचना स्वरचित व अप्रकाशित है. 

Views: 685

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Comment by Ashok Kumar Raktale on February 1, 2013 at 10:11pm

हार्दिक आभार आदरणीया दिव्या जी सादर.

Comment by MAHIMA SHREE on January 31, 2013 at 8:26pm

आदरणीय अशोक सर ..

बहुत -२ बधाई .. नवगीत के लिए .. सुंदर भावाभिव्यक्ति ..

Comment by Ashok Kumar Raktale on January 31, 2013 at 1:45pm

आदरणीय लड़ीवाला साहब सादर प्रणाम, मैंने आदरणीय सौरभ जी से कुछ मार्गदर्शन पाकर  प्रथम ही नवगीत रचने का प्रयास किया है.आपसे कुछ पंक्तियों के भाव पर सराहना पाकर बहुत हर्ष हुआ. हार्दिक आभार.

Comment by Ashok Kumar Raktale on January 31, 2013 at 1:42pm

आदरणीय राजेश कुमार झा जी सादर, आपकी रचनाओं पर भाव सम्प्रेषण तो देखते ही बनता है तब आपसे सराहना पाकर मन हर्षित है. हार्दिक आभार.

Comment by Ashok Kumar Raktale on January 31, 2013 at 1:40pm

आदरेया डॉ. प्राची जी सादर, आपके कहे को मै समझ पा रहा हूँ छोटी छोटी त्रुटियों पर ध्यान देने का अवश्य ही प्रयास करूँगा.सादर आपका निरंतर सहयोग लेखन कि बारीकियों को जानने में मदतगार रहा है. इस नव प्रयास कि कुछ पंक्तियाँ आपको अच्छी लगी जानकर प्रसन्नता हुई. हार्दिक आभार. 

 

Comment by Ashok Kumar Raktale on January 31, 2013 at 1:34pm

आदरणीय सौरभ जी सादर, हार्दिक आभार.

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on January 31, 2013 at 12:12pm

सुन्दर भाव लिए नवगीत पर सुन्दर प्रयास के लिए हार्दिक बधाई भाई श्री अशोक रक्ताले जी । निम्न शब्दों ने तो मन को प्रसन्न कर दिया -  भोर कि शाला में,

          ठिठुरते सारे ही शिशु,

          गुजरती हवा खूब लगती है। 

 

Comment by राजेश 'मृदु' on January 31, 2013 at 12:01pm

बहुत बढि़या अभिव्‍यक्ति है आपकी, सूक्ष्‍म निरीक्षण का भाव सहज ही स्‍पष्‍ट है, आगे भी आपके नवगीत पढ़ने को प्रेरित मन बहुत कुछ आशा कर रहा है, सादर


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on January 31, 2013 at 11:43am

आदरणीय अशोक रक्ताले जी ,

नवगीत पर आपका यह प्रयास रुचिकर है, सुन्दर है...

भोर कि शाला में----------------यहाँ शायद की है,

ठिठुरते सारे ही शिशु,

यह पंक्ति बहुत नयी सी और सुन्दर लगी,

हार्दिक बधाई इस सार्थक नवप्रयास पर.


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on January 31, 2013 at 11:29am

द्वार पर होती हो दस्तक
कम हैं ऐसे भी मौके,
करें तंग दरारें,गुजरती
हवा खूब लगती है।

इन अनुभवजन्य पंक्तियों के लिए बहुत-बहुत बधाई, आदरणीय अशोकजी. आपके सतत प्रयास पर हार्दिक शुभकामनाएँ.. .

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