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ग़ज़ल "संदली सा बदन है क्या कहिये"

========ग़ज़ल=======

संदली सा बदन है क्या कहिये
फूल जैसी छुअन है क्या कहिये

जल उठा है बदन तुझे छूकर
हुश्न है या अगन है क्या कहिये

सर से पा तक तुझे वो छूता है
आपका पैरहन है क्या कहिये

तीर नज़रो के जब चलें दिल पर
होती मीठी चुभन है क्या कहिये

घर मेरा आप जैसा गुल पा कर
खुद को समझे चमन है क्या कहिये

इश्क का रोग लग गया शायद
खोया खोया जेहन है क्या कहिये

हमसे नज़रें चुराते फिरते हैं  
राज-ए-उल्फत दफ़न है क्या कहिये

"दीप" सब जानते हैं ये तेरी
दिल्लगी आदतन है क्या कहिये

संदीप  पटेल  "दीप"

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Comment

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Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on February 2, 2013 at 7:21pm

तहे दिल से शुक्रिया आपका राम जी स्नेह बनाये रखिये

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on February 2, 2013 at 7:21pm

बहुत बहुत शुक्रिया आपका बंधुवर अरुण जी ......स्नेह यूँ ही बनाये रखिये

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on February 2, 2013 at 7:20pm

बहुत बहुत शुक्रिया आपका आदरणीया आरती जी स्नेह यूँ ही बनाये रखिये

Comment by ram shiromani pathak on February 2, 2013 at 6:46pm

वाह !!..दिल्लगी आदतन है क्या कहिये..बहुत खूब बधाई..

Comment by अरुन 'अनन्त' on February 2, 2013 at 6:12pm

मित्रवर बहुत दिलचस्प ग़ज़ल कही है, मुहब्बत का यह सुन्दर रूप दिल लुभा रहा है, हार्दिक बधाई स्वीकारें.

Comment by Aarti Sharma on February 2, 2013 at 5:47pm

वाह !!..दिल्लगी आदतन है क्या कहिये..बहुत खूब बधाई..

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