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जब घिर जाता है तिमिर में,
शून्य सलीब पर

टंग जाता है तन
और मुक्ति चाहता है मन
माँगती हूँ परिदों से
पंख उधार
और कल्पना की पराकाष्ठा
 छूने निकल जाती हूँ
मलय के संग
उडती हुई पतझड़ के
पत्ते की तरह
जुड़ जाती हूँ
बकुल श्रंखला में
चुपके से,
मेघों के साथ लुकाछिपी
का खेल खलते हुए
जब थक जाती हूँ
फिर बूंदों के संग
लुढ़कती हुई
चली आती हूँ धरा पर
वापस
अपने आवरण में||

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on February 25, 2013 at 10:32pm

 आदरणीय सौरभ जी  आपको मेरी कल्पना की  उड़ान  पसंद आई ,रचना पसंद आई सुंदर शुभेच्छा हेतु हार्दिक आभार आपका


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on February 25, 2013 at 10:29pm

 प्रिय संदीप  जी  आपको मेरी कल्पना कि उड़ान  पसंद आई ,रचना पसंद आई सुंदर प्रतिक्रिया हेतु हार्दिक आभार आपका


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on February 25, 2013 at 10:28pm

 प्रिय प्राची जी  आपको मेरी कल्पनाये पसंद आई ,रचना पसंद आई सुंदर प्रतिक्रिया हेतु हार्दिक आभार आपका सच में परिंदों को देख् कर बहुत बार कल्पना करती हूँ की काश हमे भी पंख मिलते और हम भी उच्च गगन में उड़ आते 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on February 25, 2013 at 10:23pm

आदरणीय लक्ष्मण जी  आपको रचना पसंद आई सुंदर प्रतिक्रिया हेतु हार्दिक आभार आपका


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on February 25, 2013 at 10:21pm

ब्रजेश कुमार सिंह जी आपको रचना पसंद आई हार्दिक आभार आपका

Comment by विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी on February 25, 2013 at 9:56pm
आदरणीया राजेश कुमारी जी!
बहुत उन्मुक्त भाव से कल्पना-उड़ान भरा है आपने,निरभ्र आकाश की अनन्त ऊंचाई तक।ईश्वर से प्रार्थना है यह उड़ान निरन्तर उन्नत से उन्नतर होती जाये।
//माँगती हूँ परिदों से
पंख उधार
और कल्पना की पराकाष्ठा
छूने निकल जाती हूँ
मलय के संग//
इन पंक्तियों के लिये विशेष बधाई।
Comment by ram shiromani pathak on February 25, 2013 at 9:02pm

वाह वाह क्या कल्पना की उड़ान है .................बेहतरीन अभिव्क्ति हुई है!!!!!

जब घिर जाता है तिमिर में,
शून्य सलीब पर

टंग जाता है तन 
और मुक्ति चाहता है मन 
माँगती हूँ परिदों से 
पंख उधार 
और कल्पना की पराकाष्ठा
 छूने निकल जाती हूँ 
मलय के संग 
उडती हुई पतझड़ के
पत्ते की तरह!


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on February 25, 2013 at 8:44pm

भाव-शब्दों से बने इस अनुपम चित्र के लिए हार्दिक बधाई, आदरणीय राजेशकुमारीजी.

शुभेच्छाएँ !

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on February 25, 2013 at 8:15pm

वाह वाह क्या कल्पना की उड़ान है .................बेहतरीन अभिव्क्ति हुई है आदरणीया मेम

सादर बधाई आपको


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on February 25, 2013 at 6:36pm

आपकी कल्पनाओं की खूबसूरती...............वाह ! मन खुश हो गया इतने कोमल , सुन्दर, प्रकृति के संग उड़ते, बादलों से लुका-छुपी खेलते, देहबोध की सीमाओं से पार की सैर कर के...

हार्दिक बधाई इस सुन्दर कल्पना पर.

सादर.

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