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"फूल हो क्या तुम" ????

"फूल हो क्या तुम" ????

तुमसे खूबसूरत कौन होगा
क्या नाज़ुकी है
क्या तराश है
इस दुनिया मैं कोई नही
दूजा तुमसा
भँवरे तुम्हे यूँ भरमाते हैं
और तुम
इठलाने लगती हो
फूल हो क्या तुम ??

पता है
एक कोना होता है
जिस्म में
छोटा सा
जो हम सब को
सच ही बताता है
सच ही दिखाता है
रूको रूको
यूँ मत मुस्कुराओ
तुम जो सोच रही हो न !
दिल नहीं है
वो है दिमाग
जो काम नहीं करता
हाई टेक झूठ के आगे
क्यूँकि
ये झूठ होता ही
इतना मीठा है
की सात क्या
चौदह जन्म तक
तुम्हे भरमा सकता है
और तुम
बन जाती हो
मक्खी और
झूठा गुड
तुम चिपकी रहती हो
उसी से
फूल हो क्या तुम ???

आईने तोड़ दिए
तुमने
देखती हो
उसकी आँखों से
जिसमे तुम
सजी धजी
गुड़िया सी
हवस की भूख
मिटाती
उसकी जान बनी रहती हो
फिर मन भर जाने
पर तुम फिर बन जाती हो
गुड मे चिपकी मक्खी
जिसे वो निकाल फेंकता है
अपने सोने के पहले
पीने वाले दूध से
क्यूँक़ि
उसके पास तुम जैसा कोई
नया फूल है
जिसमे शहद है
शहद
लेकिन फिर भी
फूल तो हो तुम

है कि नहीं

कविता है ये
सच्ची
और तुम किरदार
पूछो मैं कौन
मैं हूँ
तुम्हारे घर का आईना
जिसमे धूल जम चुकी है
आज देखना जाकर के

फूल हो क्या तुम ?????

संदीप पटेल "दीप"

Views: 440

Comment

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Comment by Dr.Ajay Khare on March 18, 2013 at 2:43pm

sandeep ji sunder rachana ke liye badhai

Comment by डॉ नूतन डिमरी गैरोला on March 18, 2013 at 9:09am

सच का आइना  दिखाती सुन्दर कविता 

Comment by ram shiromani pathak on March 17, 2013 at 12:45pm

पता है 
एक कोना होता है 
जिस्म में 
छोटा सा 
जो हम सब को 
सच ही बताता है 
सच ही दिखाता है 
रूको रूको
यूँ मत मुस्कुराओ 
तुम जो सोच रही हो न ! 
दिल नहीं है 
वो है दिमाग
जो काम नहीं करता 
हाई टेक झूठ के आगे.......अच्छी लगी,संदीप भाई हार्दिक बधाई  


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on March 16, 2013 at 9:13pm

//फूल हो क्या तुम ??//

बढ़िया प्रयास है, एक प्रश्न जो पूरी रचना में केंद्र विन्दु की भाति निर्वाह करता है, रचना अच्छी लगी, बधाई स्वीकार हो ।  

कृपया ध्यान दे...

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