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मत्तगयन्द संग होरी.

लाल ललाम ललाट लिए,

ललि लागत है ललना अति गोरी,

 

      गाल गुलाल गुबार गुमा,

      गम गौण गिनावत है यह होरी,

 

            नाच नचावत नाम नरे,

            नभ नील बजावत बांसुरि ओरी,

 

                   तान तनी तन तार दिया,

                   तब भीज गई मम चूनर कोरी//

 

मौलिक/अप्रकाशित.

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Comment by राजेश 'मृदु' on March 25, 2013 at 12:38pm

क्‍या बात है आदरणीय, अनुप्रास की छटा तो देखते ही बनती है, सादर

Comment by Ashok Kumar Raktale on March 25, 2013 at 8:37am

भाई राम शिरोमणि जी, आदरणीय डॉ. अजय खरे साहब, आ. जवाहर जी भाई आदरणीया वन्दना तिवारी जी, आ. केवल प्रसाद जी आप सबकी प्रतिक्रियाएं मेरा मनोबल बढ़ा रही है. आप सभी का हृदयातल से आभार.

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on March 24, 2013 at 12:36pm

आदरणीय,  अशोक कुमार रक्ताले जी, बहुत सुन्दर! हार्दिक बधाई स्वीकार करें।

Comment by Vindu Babu on March 24, 2013 at 10:21am
आदरेय रक्ताले महोदय सादर नमन्।
आपकी कलापूर्ण रचना ने शब्दहीन कर दिया।आपकी छोटी सी रचना भी बहुत से साहित्यित गुरों का दर्शन करा रही है।
सादर बधाई स्वीकारें।
Comment by JAWAHAR LAL SINGH on March 23, 2013 at 8:09pm

आदरणीय अशोक जी, सादर अभिवादन!

बहुत ही सुंदर मनभावन रचना!

Comment by Dr.Ajay Khare on March 23, 2013 at 12:24pm

raktale ji really u r great nice rachana badhai

Comment by ram shiromani pathak on March 23, 2013 at 12:12pm

आदरणीय आनंद आ गया .....बहोत खूब प्राणाम सहित हार्दिक बधाई 

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