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दाइज ऐसा देना बाबुल

दाइज ऐसा देना बाबुल

जिससे तन-मन जले नहीं

दर्द-वेदना के सिक्‍कों से

जो बेबस हो तुले नहीं

ना गुलाब की कलियां न्‍यारी

स्‍वर्णहार ना चूड़मणि

नहीं मुलायम गद्दी, सोफे

नहीं रेशमी लाश बुनी

देना बाबुल ऐसा ताला

जो बुद्धि पर लगे नहीं

अम्‍लान रूढि़यों की ठोकर से

जो बेदम हो खुले नहीं

लाड़-प्‍यार चाहे ना देना

ना लेना मेरी पोथी

जनमजली ना करना मुझको

शिक्षा बिन सब हैं रोती

देना बाबुल खूब दुआएं

ज्ञान दीप ले सदा चलूं

सुंदरतम है दाइज यह तो

दूध नहाउं पूत फलूं

बिना ज्ञान के विदा ना होऊं

काठ की हांडी बनी जलूं

समय सुहागा उड़ता जाए

यह दाइज अब ना खोऊं

(सर्वथा मौलिक एवं अप्रकाशित)

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on April 14, 2013 at 7:39am

देना बाबुल ऐसा ताला

जो बुद्धि पर लगे नहीं

अम्‍लान रूढि़यों की ठोकर से

जो बेदम हो खुले नहीं

लाड़-प्‍यार चाहे ना देना

ना लेना मेरी पोथी

जनमजली ना करना मुझको

शिक्षा बिन सब हैं रोती..

प्रेरक पंक्तियों के पिए बधाई, आदरणीय राजेश भाई जी. ..

Comment by Ashok Kumar Raktale on April 5, 2013 at 8:42pm

सादर, बिलकुल सही बेटी को पैत्रक सम्पत्ति मिलना ही चाहिए. वर पक्ष द्वारा विवाह में उड़ाने की बात समझ नहीं आयी.

Comment by राजेश 'मृदु' on April 5, 2013 at 2:47pm

आदरणीय राम शिरोमणि जी, रक्‍ताले जी, वन्‍दना जी, केवल प्रसाद जी, सीमा जी एवं कुंति मुखर्जी जी रचना का संज्ञान लेने के लिए बहुत आभार  । आदरणीय रक्‍ताले साहब मैंने दहेज विरोध को केंद्र में रखना नहीं चाहा है क्‍योंकि मूलत: मैं इसका विरोधी नहीं हूं हां समाज से यह अपेक्षा जरूर रखता हूं कि बहुतेरे ऐसे राज्‍य हैं जहां बेटियों को पैतृक संपत्ति का अधिकार नहीं दिया जाता जो मेरे और कानून दोनों के हिसाब से गलत है, वहां उन्‍हें वह भाग उनके नाम से मिलना चाहिए ना कि वर पक्ष को विवाह में उड़ाने के लिए, सादर

Comment by ram shiromani pathak on April 5, 2013 at 12:03pm

बहुत सुन्दर आदरणीय राजेश झा जी।बहुत मार्मिक  रचना,बधाई स्वीकारें।

Comment by Ashok Kumar Raktale on April 5, 2013 at 8:45am

लाड़-प्‍यार चाहे ना देना

ना लेना मेरी पोथी.............बिलकुल सही यही समय की मांग है.

आदरणीय राजेश कुमार झा साहब बहुत मार्मिक रचना भावों में बहा ले जा रही है.वाह! मगर कुछ वे लडके भी तो समझें जो स्वयं या दहेज लोभी माता पिता के साथ खड़े होते हैं. सुन्दर भावपूर्ण रचना पर हार्दिक बधाई स्वीकारें.

Comment by Vindu Babu on April 4, 2013 at 10:34pm
बहुत सुन्दर आदरणीय राजेश झा जी।
शिक्षा जीवन का रत्न है यही एक सर्वोत्तम उपहार हो सकता है जिससे जीवन मे सब कुछ सुलभ है।
सादर
Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on April 4, 2013 at 10:05pm

आदरणीय मित्र राजेश कुमार झा जी,  बहुत सुन्दर भाव। समसामयिक विषय बेहतरीन नजीर, बधाई स्वीकारें।

Comment by seema agrawal on April 4, 2013 at 6:35pm

बहुत सुन्दर विषय चुना राजेश जी स्त्री स्वतन्त्रता के नारों की अपेक्षा स्त्री शिक्षा और जाग्रति के नारों की ज्यादा आवश्यकता है इस देश में बिना विवेक  और शिक्षा ,स्वतन्त्रता किसी ज़ंजीर  से कम नहीं होती ........

Comment by coontee mukerji on April 4, 2013 at 5:28pm

बहुत मार्मिक  रचना .राजेश कुमार जी , दहेज तो समाज का अभिशाप है .

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