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कुण्डलियाँ छंद - लक्ष्मण लडीवाला

 
सहन करे आलोचना, नेता वही महान,
ताने सहना सीख ले, नेता असली  मान |
 नेता असली मान, मन में राज छुपाय ले,  
संख्या बल का भान, समर्थन भी जुटाय ले |
वोटो का रख मान, गिद्ध द्रष्टि इनपर धरे,
समय का रखे ध्यान, लात भी वह सहन करे| 
.
(2)
सच का साहस जो करे,तनहा वह रह जाय  
देर तक खामोश  रहे, सन्नाटा छा जाय |
सन्नाटा छा जाय, पर नहि जमीर बेचना,
साथ अगर हो नाथ, नहीं फिर तम से डरना|
चुने दर्द का साथ,  खेल है यह हिम्मत का,
कह लक्ष्मण कविराय,जुटाले साहस सच का|

 

 
- लक्ष्मण प्रसाद लडीवाला    

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Comment

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Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on April 17, 2013 at 9:41am

कुंडलियाँ छंद द्रष्टि डालकर टिप्पणी करने के लिए आपका हार्दिक आभार आदरणीय श्री सौरभ पाण्डेय जी 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on April 17, 2013 at 12:22am

आपकी कुण्डलिया छंद रचना के लिए हार्दिक बधाई आदरणीय लक्ष्मण प्रसाद जी.. .

सादर

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on April 16, 2013 at 3:45pm

सच के साहस पर रची कुंडलिया छंद पसंद कर सराहने के लिए आपका हार्दिक आभार श्री योगी सारस्वत जी 

यूँ ही स्नेह बनाए रखे, शुभम 

Comment by Yogi Saraswat on April 16, 2013 at 11:29am
सच का साहस जो करे,तनहा वह रह जाय  
देर तक खामोश  रहे, सन्नाटा छा जाय |
सन्नाटा छा जाय, पर नहि जमीर बेचना,
साथ अगर हो नाथ, नहीं फिर तम से डरना|
चुने दर्द का साथ,  खेल है यह हिम्मत का,

कह लक्ष्मण कविराय,जुटाले साहस सच का

वाह

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on April 10, 2013 at 9:25am

जी, अशोक जी. प्रथम दोहे के सैम चरण को "नीता असली मान" संशोधित करना भूल गया, फिर पोस्ट होने के

बाद महोत्सव-30 के आयोजन में एडिट करना भूल गया | दुसरे छंद में मै यह कहना चाह रह था कि सच बोलने

वाले को इस दुनिया में साथ नहीं मिलता और तनहा रहना पड़ता है | "तनहा वह रह जाय" से पाठक सुगमता

से समझ सकेंगें, आपका सुझाव उचित है |उचित मार्ग दर्शन एवं कुंडलियों के भाव पसंद करने के लिए आपको

बहुत बहुत आभार श्री अशोक रक्ताले जी  

Comment by Ashok Kumar Raktale on April 10, 2013 at 9:02am

आदरणीय लड़ीवाला साहब सादर प्रणाम, सुन्दर कुण्डलिया छंद लिखे हैं. बधाई स्वीकारें.

प्रथम छंद में सम चरण को ज्यों का त्यों ही रखते हैं किन्तु आपने कुछ उलट पुलट कर दिया है.

द्वितीय दोहे के प्रथम पद का अर्थ नहीं निकल रहा है. इसे हम ऐसा कहें " सच का साहस जो करे, तनहा वह रह जाय," तो कैसा रहे.

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on April 9, 2013 at 6:35pm

हार्दिक आभार आपका श्री राजेश कमार झा साहब, अभी तो सीखने के ही प्रयास में हूँ राजेश जी 

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on April 9, 2013 at 6:33pm

हार्दिक आभार आपका आदरणीया मीना पाठक जी 

Comment by राजेश 'मृदु' on April 9, 2013 at 4:46pm

आदरणीय लड़ीवाला जी बहुत सुंदर प्रयास हुआ है । आपकी सबसे बड़ी विशेषता यही है कि आप सतत प्रयत्‍नशील रहते हैं, सादर

Comment by Meena Pathak on April 8, 2013 at 7:48pm

छंद और कुंडलियों का मुझे कोई ज्ञान नही है पर पढ़ के अच्छा लगा आदरणीय .. बधाई 

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