For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

नई कविता - वीनस केसरी

नई कविता जो आज रात पुरानी हो गई

मैं चाहता था

ख़्वाब मखमली हों और उनमें परियां आएँ

सूरज की तरह किस्मत हर दिन चमकदार हो

और जब सलोना चाँद रास्ता भटक जाए,
तो तारों से राह पूछने में उसे शर्म न लगे

 

ये भी चाहा कि,
मैं पूरी शिद्दत से किसी को पुकारूं

और वो मुड कर मुझे देख कर मुस्कुराए  

हम सुलझते सुलझते, थोडा सा फिर उलझ जाएँ

प्यार करते करते लड़ पड़ें

और लड़ते लड़ते प्यार करना सीखें

 

चाहता था मैं जान लूँ   

जब टकराती हैं नज़र से नज़र
तो वो हादिसा हसीन क्यों होता है

सीखूं गणित के वो दांव पेंच
जिसमें दो और दो चार की जगह

कुछ और होने लगता है


जिंदगी ऊन के गोले सी नर्म हो
वक्त जब स्वेटर बुने तो उसका डिजाइन हमेशा नया रहे

ऐसी ही कुछ और चाहतें,
जिसको लोग हसीन कहते थे


चाहता था सारे ख़्वाब पूरे हो जाएँ

और हुए

ख़्वाब में परियां आईं
और किस्मत सूरज के जैसी चमकदार हो गई 

हर प्रश्न का उत्तर मिल गया 

मगर साथ ही मिले कुछ जवाब
जिनके सवाल नदारद थे


जाने किसने पूछा था ...

मगर जब जवाब हैं तो सवाल भी रहे होंगे ...


उन जवाबों के कारण मैंने यह जान लिया कि,

चाँद रोटी भी होता है

ख़्वाब में परियां केवल तब ही आती हैं,
जब हम भर पेट खाना खा कर सोए हों

पटरियों पर बिखरे प्लास्टिक के टुकड़े और कागज़ की कतरनें
चावल के वो दाने हैं जिनको चिड़िया नहीं चुग पाती


मैंने यह भी जाना  

कारखाने इंसानों को लील कर टीवी और फ्रिज बना रहे हैं 

रोटी कपडा मकान के सारे वादे झूठे थे

रजिस्टर के पन्ने में एक के आगे अनंत गोले हैं
और अनाज भरे बोरे गोदामों में सड़ गये हैं

आदमी खरीदे जा रहे हैं पुरूस्कार बिकते हैं

जो नहीं बिकना चाहता उसका भाव रद्दी से भी कम हो जाता है   


और मैंने यह भी जाना
बाज़ार में मिलावटी खून सस्ता मिलता है  
रिश्ते कैडबरी चाकलेट की तरह मीठे नहीं रह गये
जीने का हक सिर्फ कुछ लोगों को है
जो यह भी तय करते हैं किसे जीने देंगे और किसे ...

 

मैं अब भी

ख़्वाब में परियां को बुलाना चाहता हूँ

मगर अब मुझे नींद नहीं आती

- वीनस

Views: 612

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on April 18, 2013 at 1:39am

उद्विग्न मन विसंगतियाँ का परिणाम होता है. लेकिन जब उद्विग्नता आत्म-विश्लेषण की पराकाष्ठा हो तो प्रस्तुतिकरण के बिम्ब एक अलग ही संदर्भ में प्रस्तुत होते हैं. प्रस्तुत रचना की सार्थकता इसी तथ्य को प्रतिस्थापित करने के कारण है.

अपनी चिर-परिचित शैली अलग आपने कुछ कहा है वीनस भाई, यह उतना महत्वपूर्ण नहीं है जितना कि यह बनाये रखना कि संप्रेषणीयता इस नई विधा में भी कमाल की है.जो आपकी रचनाओं और ग़ज़लों की वशिष्टता हुआ करती है. 

इस सार्थक प्रस्तुतिकरण के लिए भूरि-भूरि बधाई तथा अनेकानेक शुभकामनाएँ..

Comment by Ashok Kumar Raktale on April 11, 2013 at 10:13pm

रजिस्टर के पन्ने में एक के आगे अनंत गोले हैं
और अनाज भरे बोरे गोदामों में सड़ गये हैं

आदमी खरीदे जा रहे हैं पुरूस्कार बिकते हैं

जो नहीं बिकना चाहता उसका भाव रद्दी से भी कम हो जाता है ..............वाह! बहुत खूब!

सुन्दर रचना आदरणीय वीनस जी. हार्दिक बधाई स्वीकारें.

Comment by ram shiromani pathak on April 9, 2013 at 7:45pm

आदरणीय वीनस केसरी जी,लाजवाब,शानदार . यथार्त से ओत प्रोत

Comment by राजेश 'मृदु' on April 9, 2013 at 5:16pm

इस शानदार, जानदार एवं दमदार रचना के लिए ढेरों बधाई

Comment by Savitri Rathore on April 9, 2013 at 4:54pm

आदरणीय वीनस जी,नमस्कार !
आपकी कविता अच्छी लगी .....जो कल्पनाओं के कोमल धरातल पर चलते -चलते अचानक यथार्थ के कठोर मार्ग पर आ खड़ी होती है ......सुन्दर प्रस्तुति ..........बधाई हो।

Comment by vijayashree on April 9, 2013 at 3:43pm

मैं अब भी

ख़्वाब में परियां को बुलाना चाहता हूँ

मगर अब मुझे नींद नहीं आती

 

अर्थपूर्ण रचना ......हार्दिक बधाई

 

 

Comment by vijay nikore on April 9, 2013 at 11:41am

आदरणीय वीनस जी:

 

और मैंने यह भी जाना बाज़ार में मिलावटी खून सस्ता मिलता है  रिश्ते कैडबरी चाकलेट की तरह मीठे नहीं रह गये जीने का हक सिर्फ कुछ लोगों को है जो यह भी तय करते हैं किसे जीने देंगे और किसे ...


//मैं अब भी

ख़्वाब में परियां को बुलाना चाहता हूँ

मगर अब मुझे नींद नहीं आती//

 

एक बहुत ही खूबसूरत रचना के लिए बधाई।

 

सादर,

विजय निकोर

 

Comment by नादिर ख़ान on April 9, 2013 at 11:23am

चाँद रोटी भी होता है

ख़्वाब में परियां केवल तब ही आती हैं, 
जब हम भर पेट खाना खा कर सोए हों

पटरियों पर बिखरे प्लास्टिक के टुकड़े और कागज़ की कतरनें 
चावल के वो दाने हैं जिनको चिड़िया नहीं चुग पाती.............

अनाज भरे बोरे गोदामों में सड़ गये हैं

आदमी खरीदे जा रहे हैं पुरूस्कार बिकते हैं

जो नहीं बिकना चाहता उसका भाव रद्दी से भी कम हो जाता है ....

मैं अब भी

ख़्वाब में परियां को बुलाना चाहता हूँ

मगर अब मुझे नींद नहीं आती

सही कहा आदरणीय वीनस जी इन्ही सवालों ने हम सब की नींद उड़ा रखी है ।

शानदार सोच और उम्दा रचना के लिए बधाई स्वीकारें ।

Comment by coontee mukerji on April 9, 2013 at 10:04am

वीनस केसरी जी , लाजवाब . यथार्त से ओत प्रोत .बहुत बहुत बधाई .

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on April 9, 2013 at 9:13am

आदरणीय वीनस केसरी जी, सादर प्रणाम!  वाह वाह!!, हाय!, हय...?  कोटि कोटि नमन इससे कुछ कम नहीं, बहुत सुन्दर कविता।  हार्दिक बधाई।  सादर,

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

आशीष यादव posted a blog post

मशीनी मनुष्य

आज के समय में मनुष्य मशीन बनता जा रहा है या उसको मशीन बनने पर मजबूर किया जाता है. कारपोरेट जगत…See More
yesterday
Ashok Kumar Raktale replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 178 in the group चित्र से काव्य तक
"आदरणीय अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव साहब, प्रस्तुत दोहों की सराहना हेतु आपका हार्दिक आभार। सादर"
yesterday
Ashok Kumar Raktale replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 178 in the group चित्र से काव्य तक
"आदरणीय जयहिंद रायपुरी जी सादर, प्रदत्त चित्र पर आपने  दोहा छंद रचने का सुन्दर प्रयास किया है।…"
yesterday
अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 178 in the group चित्र से काव्य तक
"आदरणीय अशोक भाईजी  सही कहना है हम भारतीय और विशेषकर जो अभावों में पलकर बड़े हुए हैं, हर…"
yesterday
अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 178 in the group चित्र से काव्य तक
"आदरणीया प्रतिभाजी हार्दिक धन्यवाद आभार आपका"
yesterday
अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 178 in the group चित्र से काव्य तक
"आदरणीय अशोक भाईजी  हार्दिक धन्यवाद आभार आपका।"
yesterday
Ashok Kumar Raktale replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 178 in the group चित्र से काव्य तक
"आदरणीय भाई लक्ष्मण धामी जी सादर, प्रदत्त चित्र पर मेरी प्रस्तुति की सराहना के लिए आपका हार्दिक…"
yesterday
Ashok Kumar Raktale replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 178 in the group चित्र से काव्य तक
"    आदरणीया प्रतिभा पाण्डे जी सादर, प्रस्तुत दोहों की सराहना के लिए आपका हार्दिक आभार ।…"
yesterday
Jaihind Raipuri replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 178 in the group चित्र से काव्य तक
"किल्लत सारे देश में, नहीं गैस की यार नालियाँ बजबजा रही, हर घर औ हर द्वार गैस नहीं तो क्या हुआ, लोग…"
yesterday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 178 in the group चित्र से काव्य तक
"आ. भाई सौरभ जी, सादर अभिवादन। दोहों पर आपकी विस्तृत टिप्पणी और सुझाव के लिए हार्दिक…"
yesterday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 178 in the group चित्र से काव्य तक
"आ. प्रतिभा बहन, सादर अभिवादन। चित्रानुरूप सुंदर दोहे हुए हैं। हार्दिक बधाई।"
yesterday
pratibha pande replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 178 in the group चित्र से काव्य तक
"*पका न पाती  रोटियाँ, भले  युद्ध की आगजला रही है नित्य पर, वह निर्धन का…"
yesterday

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service