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एक बार वो लड़की बनकर तो देखे.....

तेरे सपनो की कोई औकात नहीं 
मेरे सपने हैं बहुत बड़े
मुझसे जब यह बात कही उसने 
मेरे दिल ने बस एक बात कही......

एक बार वो लड़की बनकर तो देखे
खुद- ब- खुद समझ जायेगा मेरी मज़बूरी को
क्यों इतने छोटे हैं मेरे सपने
वो भी समझ जायेगा इस सच्चाई को
एक बार वो ........................

बचपन से ही मैंने सीखा
जो मुझको दुनिया ने सिखाया
माँ ने सिखाया, पापा ने सिखाया
मेरे बड़े भाई ने सिखाया,
तू लड़की है,
लड़की बन कर रह तू
घर के काम में ध्यान लगा
सपनो की धारा में न बह तू
एक बार वो लड़की सा सुनकर तो देखे
खुद- ब - खुद समझ जायेगा मेरी मज़बूरी को
एक बार वो .......................

जब भी मैंने बढ़ना चाहा
आगे बढकर पढ़ना चाहा
कदमो में मेरे डाली बेड़ी 
मैं लड़की हूँ , बस इसलिए न खेली ??????

उड़ना नहीं सीखा मैंने
मेरे पंखो की भी खता नहीं
उड़ने से पहले ही पंख गवां बैठी
लड़की होने की मुझे सजा मिली
एक बार वो लड़की -सा हो कर तो देखे
खुद- ब - खुद समझ जायेगा मेरी मज़बूरी को !!

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Comment

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Comment by Ashok Kumar Raktale on April 22, 2013 at 8:09pm

आदरणीया सोनम जी. सच है हमारे समाज में लड़कियों के पैरों में बेडी पड़ी रहती है. कोई पुरुष इसको न समझे तो फिर ऐसे भाव आना स्वाभाविक है. सुन्दर भावपूर्ण रचना. बधाई स्वीकारें.


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Comment by rajesh kumari on April 17, 2013 at 8:15pm

सोनम जी हालांकि आपने बहुत कुछ सच्चाई बयाँ  की है किन्तु अब वक़्त के धारे के साथ बहना है इतनी बंदिशों मजबूरियों के बाद भी आज लड़की ने अपनी काबिलियत का परिचय दिया है एक छोटा सा उदाहरण ---घर का काम करके भी पढ़ाई में लड़कों से ज्यादा नंबर लाती है उनसे कहिये लड़की बनकर ऐसा करके तो दिखाइये माँ बनकर सबको संभालती हैं बाहर नौकरी भी करती हैं ये सब करके दिखाइये । शायद आपकी पोस्ट पहली बार ही पढ़ी है अच्छा लिखा है आपने लिखती रहिये शुभकामनायें |

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on April 17, 2013 at 6:52pm

आदरणीया सोनम जी, ’कदमो में मेरे डाली बेड़ी
मैं लड़की हूँ ए बस इसलिए न खेली ?????
उड़ना नहीं सीखा मैंने’ अतिसुन्दर । बधाई स्वीकारें। सादर,

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on April 17, 2013 at 2:16pm

जब भी मैंने बढ़ना चाहा
आगे बढकर पढ़ना चाहा
कदमो में मेरे डाली बेड़ी 
मैं लड़की हूँ , बस इसलिए न खेली ??????

उड़ना नहीं सीखा मैंने
मेरे पंखो की भी खता नहीं
उड़ने से पहले ही पंख गवां बैठी
लड़की होने की मुझे सजा मिली
एक बार वो लड़की -सा हो कर तो देखे
खुद- ब - खुद समझ जायेगा मेरी मज़बूरी को !!

सत्य है, 

बधाई 

Comment by vijay nikore on April 17, 2013 at 1:18pm

सोनम जी:

 

इस विषय पर जितना लिखा जाए कम है। हम सभी को मिल कर नारी का उत्थान करना है।

शायद आपने मेरी कविता "नारी का मन" पढ़ी होगी ... नारी के मन पर क्या बीतती है, उसमें यह

दृष्टांत किया था।

 

आपकी रचना के भाव सत्य से भरपूर हैं।

बधाई। लिखते रहिए।

 

सादर,

विजय निकोर

Comment by Shyam Narain Verma on April 17, 2013 at 12:01pm
बहुत बहुत बधाई इस सुन्दर रचना के लिए .................
Comment by ram shiromani pathak on April 17, 2013 at 11:59am

बहुत सुन्दर रचना बन पड़ी है बहन सोनम जी !! हार्दिक बधाई 

Comment by Yogi Saraswat on April 17, 2013 at 11:50am

आगे बढकर पढना चाहा
कदमो में मेरे डाली बेडी
मैं लड़की हूँ , बस इसलिए न खेली ??????

उड़ना नहीं सीखा मैंने
मेरे पंखो की भी खता नहीं
उड़ने से पहले ही पंख गवां बैठी
लड़की होने की मुझे सजा मिली
एक बार वो लड़की -सा हो कर तो देखे
खुद- ब - खुद समझ जायेगा मेरी मज़बूरी को !!

सोनम जी , यहाँ आपसे असहमत हूँ ! जहां चाह वहां राह ! बात मानने की है की लड़कियों के लिए सब कुछ आसान नहीं होता लेकिन बहुत लड़कियां ऐसी भी हैं जिन्होंने इस चुनौती को स्वीकार किया है और अपने नाम और काम को बुलंदियों तक पहुँचाया है !

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