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कैसी जिंदगी ..लघु कथा / कुशवाहा

कैसी जिंदगी   ..लघु कथा / कुशवाहा 
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समाज उत्थान , समाज सेवा ऐसा नशा है कि जिसे लग गया तो लग  गया . छूटेगा जीवन के साथ . यही हाल पुष्पा जी का है. वैसे तो उनका निश्चित समय है क्षेत्र में जाने का. पर कोई सूचना मिली या कोई फरियादी द्वार पर आ गया तो फिर क्या डाली चप्पल पैर  में और कंधे पर शाल या चदरा ,निकल पडी सेवा करने को. घर में बने, आश्रम, ही  कहिये का अलग काम तो है ही. अगर उनसे कोई पूँछ ले दीदी इतना खर्चा कैसे उठाती  हैं, क्या सरकार से धन लेती हैं. शालीनता से पुष्पा जी का जवाब होता है कि  भीख मांग के ... सेवा देना क्या सेवा है. व्यवस्था बनाइये परिवार जैसे चलातें है वैसे चलाइए .
ये कथा तो पञ्च तंत्र या कोई भी हो जैसी लंबी है. संक्षेप में कहूँ तो पुष्पा   जी भ्रमण के समय एक ऐसे परिवार में पहुंची  जिसकी मुखिया स्त्री थी ,उसके  पति का देहांत एक दुर्घटना में हो गया था..पार्वती देवी के यहाँ. पार्वती  स्वयं में पैरों  से विकलांग साथ पांच छोटी छोटी कन्यायें . खर्च से तंग आगे अन्धकार मय जीवन. पर थी साहसी और स्वाभिमानी. लिफ़ाफ़े बना, कपडे सिल परिवार पाल रही थी. 
पुष्पा  ने स्थिति भांपी और पारवती से कहा मैं तुम्हारी बड़ी बेटी शालिनी , यद्दपि ये तुम्हारा सहारा है, को अपने आश्रम ले जा रही हूँ, इसको अपने पास ही रखूंगी. इसका भी भविष्य सुधरेगा साथ ही तुम्हारी भी मदद हो जायेगी, तुम जानती हो मेरे यहाँ योग्यता अनुसार प्रशिक्षित किया जाता है और उसकी आर्थिक मदद भी हो जाती  है, यदि तुम्हें कोई आपत्ति न हो तो. पार्वती ने सहमति दे दी क्योंकि पुष्पा  जी  के स्वभाव से पारवती स्वयं भी परिचित थी. 
आश्रम में सारे  लोग एक साथ बैठ कर ही भोजन करते हैं. पुष्पा जी ने देखा शालिनी भोजन नही कर रही है, तो उसे प्यार से पास बुलाया बेटा क्या बात है तुम क्या अलग से भोजन करोगी. 
नही दीदी .ये बात नही है. जब से पापा नही रहे तब से हम सब एक ही समय भोजन करते रहे हैं.
प्रदीप कुमार सिंह कुशवाहा 
१८-४-२०१३ 
मौलिक/अप्रकाशित 

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Comment by Ashok Kumar Raktale on April 23, 2013 at 9:04am

आदरणीय प्रदीप जी सादर सुन्दर लघु कथा. कुछ संदेश भी मगर मन में कुछ प्रश्न भी छोड़ती है. रचना कर्म पर बहुत बहुत  बधाई स्वीकारें.

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on April 22, 2013 at 1:37pm

आदरणीय सिंह साहब जी 

सादर/सस्नेह 

मर्म को समझा. आभार. 

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on April 22, 2013 at 1:36pm

आदरणीया कुंती जी 

सादर अभिवादन. 

सत्य कथा पर आधारित लघु कथा है. 

प्रोत्साहन हेतु सादर आभार 

Comment by JAWAHAR LAL SINGH on April 22, 2013 at 5:46am

एक समय का भोजन ... समाज का दर्पण!

श्रद्धेय महोदय! कितनी आसानी से आपने बहुत बड़ी बात कह दी!

Comment by coontee mukerji on April 20, 2013 at 1:35am

जीवन की छोटी छोटी घटनाएं कितनी बड़ी सीख दे जाती है .इसका ज्वलंत उदाहरण है ......ये कैसी जिंदगी  ......कुश्वाहा जी . बहुत

बहुत बधाई

सादर  . कुंती .

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