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आधी रात के सपने देकर

तुम मुझको बहला देते हो

जब चाहे जी

अपना लेते हो

जब चाहे जी

ठुकरा देते हो

कैसे लिखूं

तुमको पतियां

तुम वादे

झुठला देते हो

आधी रात के ................

या देवी का

जयघोष तो करते

फिर क्‍योंकर

चुभला देते हो

अपने छत पर

बाग लगाकर

कलियों को

दहला देते हो

आधी रात के ................

कहती हूं जो

तुमको प्रियतम

हक फौरन

जतला देते हो

और करूं जो

हक की बातें

जी मेरा

मितला देते हो

आधी रात के ................

जाने कितनी

जंजीरों में

पग मेरे

उलझा देते हो

घनघोर घटा को

मेरा आंचल

तुम कैसे

दिखला देते हो

आधी रात के ................

तब जब करूणा

डूब मरी है

तुम अक्‍सर

मुसका लेते हो

जाने कैसे

किस मंतर से

तुम सबको

फुसला लेते हो

आधी रात के ................

नए बहाने

रोज बनाकर

तुम मुझको

धुंधला देते हो

बौने मानव   !

और कहूं क्‍या

तुम रिश्‍ते

गंदला देते हो

आधी रात के ................

(पूर्णतया मौलिक एवं अप्रकाशित)

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Comment

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on April 30, 2013 at 7:44pm

आदरणीय राजेश जी,

प्रस्तुत रचना का मर्मस्पर्शी कथ्य बिल्कुल स्त्री मन के साथ नितप्रति होते छलावे को प्रस्तुत करता है.. हर बंद में उसके छले जाने का क्रंदन है... इस संवेदनशील लेखन के लिए हार्दिक बधाई.

Comment by भावना तिवारी on April 30, 2013 at 2:31pm

आधी रात के सपने देकर

तुम मुझको बहला देते हो......

जाने कितनी

जंजीरों में

पग मेरे

उलझा देते हो

घनघोर घटा को

मेरा आंचल

तुम कैसे

दिखला देते हो

आधी रात के ..............waah ..bahut sundar ..pravahmay rachnaa ....bahut bahut badhaai ..........

किस मंतर से

तुम सबको

फुसला लेते हो

आधी रात के .......

Comment by राजेश 'मृदु' on April 30, 2013 at 2:00pm

विजय निकोर जी, आपका हार्दिक आभार

Comment by vijay nikore on April 29, 2013 at 7:01pm

भावाभिव्यक्ति अच्छी है।

 

सादर,

विजय निकोर

Comment by राजेश 'मृदु' on April 29, 2013 at 1:22pm

आदरणीय कुंति जी, बसंत नेमा जी, प्रदीप जी, लक्ष्‍मण जी एवं रक्‍ताले साहब, आप सबकी उपस्थिति एवं हर्षकारी प्रतिक्रिया आगे की रचनाओं को बड़ा बल प्रदान करेगी, सादर

Comment by राजेश 'मृदु' on April 29, 2013 at 1:20pm

आदरणीय सीमा जी, आपने बिलकुल ठीक पकड़ा है रचना पोस्‍ट करने में हड़बड़ी की बात स्‍वीकार करता हूं, इसे और पुष्‍ट किया जा सकता था परंतु मन किसी और विषय पर केंद्रित हो गया, क्षमा चाहता हूं, अगली बार ध्‍यान रखूंगा, सादर

Comment by राजेश 'मृदु' on April 29, 2013 at 1:18pm

आदरणीय केवल प्रसाद जी एवं विनय जी आपकी सुंदर प्रतिक्रिया के लिए बहुत आभार

Comment by Ashok Kumar Raktale on April 28, 2013 at 9:21am

जिसका कद किसी तरह से भी फिट न बैठे उसे बोने मानव कह देना बिलकुल ठीक है. सुन्दर रचना सादर बधाई स्वीकारें आदरणीय राजेश जी.

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on April 27, 2013 at 2:22pm

मानव की ये फिदरत है की वह अपने मतलब के खातिर बहाने बनाकर क्षणिक ख़ुशी देता है | इसको बखूबी शब्दों पिरोकर 

प्रस्तुत करने के लिए हार्दिक बधाई श्री राजेश कुमार झा जी | एक बात "जब चाहे जी" की जगह यदि "जब जी चाहे" लिखा 

जावे तो ज्यादा उचित रहेगा | सादर 

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on April 27, 2013 at 2:08pm

नए बहाने

रोज बनाकर

तुम मुझको

धुंधला देते हो

बौने मानव   !

और कहूं क्‍या

तुम रिश्‍ते

गंदला देते हो

भाव प्रधान सुन्दर रचना हेतु बधाई, आदरणीय झा साहब जी 

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