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तुमको जो प्रतिकूल लगे हैं
वे हमको अनुकूल लगे
और तुम्हें अनुकूल लगे जो
वे हमको प्रतिकूल लगे...............

हम यायावर,जान रहे हैं
फूल कहाँ पर काँटे हैं
तुमने संचय किया न जितना
हम तो उतना बाँटे हैं
तुम नत मस्तक जिसके आगे
हमको वे सब धूल लगे.............

तुम ठुकराते,हम अपनाते
फर्क यही हम दोनों में
कंकर पत्थर पर हम सोते
तुम मखमली बिछौनों में
भौतिक सुख हैं नाग विषैले
चन्दन हमें बबूल लगे..................

आये थे क्या लेकर,सोचो
क्या लेकर तुम जाओगे
जो कुछ नामे यहाँ करोगे
जमा वहाँ तुम पाओगे
जीवन की सारी सच्चाई
तुमको सदा फिजूल लगे..................

मेरा-मेरा कह कर तुमने
जग को किया पराया है
कौन हितैषी,कौन मित्र है
तुम्हें समझ ना आया है
तुमने मारे जितने पत्थर
हमको सारे फूल लगे ..............

अरुण कुमार निगम
आदित्य नगर,दुर्ग (छत्तीसगढ़)
शम्भूश्री अपार्टमेंट,विजय नगर, जबलपुर (मध्यप्रदेश)
(स्वरचित व अप्रकाशित)

Views: 1561

Comment

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Comment by Vindu Babu on June 4, 2013 at 4:01pm
आदरणीय अरुण जी आपकी भावाभ्यक्ति प्रशंसनीय है।
सादर बधाई स्वीकारें
Comment by Yogendra Singh on June 3, 2013 at 10:17pm

बहुत खूब अरुण जी 

बहुत ही उम्दा और सटीक कविता 

दिल को छू लेने वाली ॥ 

Comment by dheerendra singh bhadauriya on May 31, 2013 at 9:50am

आये थे क्या लेकर,सोचो
क्या लेकर तुम जाओगे
जो कुछ नामे यहाँ करोगे
जमा वहाँ तुम पाओगे
जीवन की सारी सच्चाई
तुमको सदा फिजूल लगे..

वाह वाह !!! बहुत उम्दा ,सच्चाई भरी प्रस्तुति,,,,

Comment by Sarita Bhatia on May 31, 2013 at 9:45am

संदेशात्मक प्रेरणात्मक रचना के लिए बधाई स्वीकारें 

Comment by shalini rastogi on May 12, 2013 at 12:46pm

तुम ठुकराते,हम अपनाते
फर्क यही हम दोनों में... अरुण जी , बहुत ही सुन्दर एवं भावपूर्ण प्रस्तुति ... परिदृश्य एक होता है परन्तु परिवेक्षण अपना अपना होता है ... इसी अन्तर को बहुत प्रभावपूर्ण ढंग से प्रस्तुत किया है आपने...

Comment by JAWAHAR LAL SINGH on May 12, 2013 at 6:25am

आये थे क्या लेकर,सोचो
क्या लेकर तुम जाओगे
जो कुछ नामे यहाँ करोगे
जमा वहाँ तुम पाओगे
जीवन की सारी सच्चाई
तुमको सदा फिजूल लगे..................

वैसे तो सभी पंक्तियाँ ही अनुकूल हैं फिर भी

जो जीवन की सच्चाई है, वे क्यों हमसबको शूल लगे!

Comment by seema agrawal on May 5, 2013 at 8:05pm

क्या कहने अरुण जी आपकी रचनात्मक उर्जा और कौशल की कायल हूँ ,जितनी सहजता उतना ही गाम्भीर्य भाव और कथ्य में ..शिल्प के बेजोड़ फेविकोल से बंधा हुया आपकी ये रचना ऐसा लगा जैसे एक बंजारा अपनी मस्ती में गीत गाता चला जा रहा हो कुछ कुछ पंक्यियाँ तो बिल्कुल मन की आर-पार जैसे ......

भौतिक सुख हैं नाग विषैले
चन्दन हमें बबूल लगे

जो कुछ नामे यहाँ करोगे
जमा वहाँ तुम पाओगे

तुमने मारे जितने पत्थर
हमको सारे फूल लगे

भौतिक सुख हैं नाग विषैले

चन्दन हमें बबूल लगे........

बहुत बहुत बधाई इस सुन्दर रचना के लिए
सीधी सुन्दर और सहज शब्दों में कही गयी रचनाएँ भी कितनी प्रभावशाली हो सकतीं हैं उसका प्रत्यक्ष उदाहरण है ये गीत 

 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on May 5, 2013 at 3:40pm

बहुत सुन्दर गीत लिखा अरुण निगम जी ,एक न एक दिन अच्छाई की जीत जरूर होती है ये सद विचार लेकर जो चला वो  तर गया । बहुत- बहुत बधाई इस गीत ले लिए |

Comment by बृजेश नीरज on May 4, 2013 at 6:42pm

बहुत ही सुन्दर, अप्रतिम रचना! शब्द कम होंगे तारीफ के लिए। परिस्थितियों को जिस तरह प्रवाह में आपने पिरोया है उसका कोई सानी नहीं। आपको बधाई!


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by अरुण कुमार निगम on May 4, 2013 at 6:33pm

प्रिय अरुण अनंत, बहुत-बहुत प्यार. मेरा संदेश पहुँचा, गीत सफल हो गया. आभार....

कृपया ध्यान दे...

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