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तुमने जो भी बात कही थी

सबको माना तेरे बाद

हो गई अपनी पीर पराई

हँस के जाना, तेरे बाद

बोझिल राते खुल के बोलीं

दिन बतियाया तेरे बाद

तेरे रहते था मैं बूढ़ा

खिली जवानी तेरे बाद

तुझे देख जो बादल गरजे

जमकर बरसे तेरे बाद

हो गई सारी दरिया खारी

रो-रो जाना, तेरे बाद

तेरे रहते दर-दर भटका

मंजिल पाई तेरे बाद

हाथों की वो चंद लकीरें

बनीं मुकद्दर तेरे बाद

यह भी तेरी रही नवाजिश

मंदिर पहुंचा तेरे बाद

बुत पूजे औ मन्‍नत मांगी

हो गया काफि़र तेरे बाद

यूं तो अक्‍सर रहा अकेला

तन्‍हा रह गया तेरे बाद

मुझको मैंनें बेदम पाया

हरपल जाना तेरे बाद

तेरे रहते दर्पण थे जो

बन गए शीशे तेरे बाद

मेरा मैं मुझसे घबराया

पल-पल जाना तेरे बाद

तुमने जितने दीप जलाए

बन गए तारे तेरे बाद

तेरी मेरी बातें करती

मिट्टी, पानी, तेरे बाद

अब तो सारे दर्द मरे हैं

कोयल भी चुप तेरे बाद

सारे भय सारी आशंका

खुद ही भागी तेरे बाद

(सर्वथा मौलिक एवं अप्रकाशित)

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Comment

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Comment by राजेश 'मृदु' on May 13, 2013 at 3:59pm

आप सबका हार्दिक आभार, आदरणीय सौरभ जी, गलती माफ करें, मैं पशोपेश में पड़ गया इसी कारण दरिया के साथ स्‍त्रीलिंग क्रिया रख दी, सादर

Comment by Ashok Kumar Raktale on May 5, 2013 at 1:02pm

विरह में उपजे भावों की सुन्दर प्रस्तुति आदरणीय राजेश जी सादर बधाई स्वीकारें इस भावपूर्ण रचना पर.

Comment by अरुन 'अनन्त' on May 4, 2013 at 9:35pm

राजेश भाई वाह आनंद आ गया सुन्दरता से परिपूर्ण प्रस्तुति, कई बंध ह्रदय स्पर्श कर गए. आपकी रचना सदैव मुझे प्रभावित करती है मेरी और से हार्दिक बधाई स्वीकारें.

Comment by Priyanka singh on May 4, 2013 at 7:42pm

बहुत खुबसुरत ''तेरे बाद''..........बधाई आपको....

Comment by बृजेश नीरज on May 4, 2013 at 6:56pm

आदरणीय बहुत ही सुन्दर! बधाई!

Comment by coontee mukerji on May 3, 2013 at 9:13pm

राजेश जी  , आपकी झोली  से एक और  सुंदर मोती की लड़ी गिरी .  हमने संजो लिया / सादर /  कुंती .

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on May 3, 2013 at 10:14am

यूं तो अक्‍सर रहा अकेला,तन्‍हा रह गया तेरे बाद

मुझको मैंनें बेदम पाया,  हरपल जाना तेरे बाद

तेरे रहते दर्पण थे जो,बन गए शीशे तेरे बाद

मेरा मैं मुझसे घबराया,पल-पल जाना तेरे बाद

तुमने जितने दीप जलाए,बन गए तारे तेरे बाद- वाह ! वाह! सुन्दर पंक्तिया राजेश जी बहुत बहुत बधाई 

 

Comment by विजय मिश्र on May 3, 2013 at 10:02am
" दुनियाँ जिसे कहते हैं जादू का खिलौना है , मिल जाए तो मिट्टी है खो जाए तो सोना " फिराकसाहब की यह लाइन कविता के आशय को मुकम्मल बयाँ करती है .
Comment by manoj shukla on May 3, 2013 at 9:27am
बहुत सुन्दर रचना बधाई स्वीकार करें आदर्णीय

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on May 3, 2013 at 7:08am

विरहजन्य उद्विग्नता को सार्थक शब्द देना भला लगा.

कई बंद प्रभावी बन पड़े हैं. आपकी रचनाओं की एक दशा होती है, उसीकी प्रच्छाया में जीती मुलायम शब्दों से अभिव्यक्त हुई प्रस्तुत रचना के लिए आपको हार्दिक बधाई, आदरणीय राजेश कुमार जी.

एक बात :

दरिया स्त्रीलिंग क्रियाएँ नहीं लेता.

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