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ग़ज़ल - उसे देखे ज़माना हो गया है

ग़ज़ल
उसे देखे ज़माना हो गया है ,
मेरा बच्चा सयाना हो गया है । 
.
मेरा दिल गाँव में बसता है बेशक ,
शहर में आब - ओ - दाना हो गया है । 
.
तेरी पायल की रुनझुन बज रही माँ ,
तेरा लोरी सुनाना हो गया है । 
.
अकेला सच का परचम ढो रहा हूँ ,
मुकाबिल ये ज़माना  हो गया है । 
.
फकीरों ने उसे दिल से दुआ दी ,
वो खुद अपना दीवाना हो गया है । 
.
बयानों में तुम्हारे ताजगी है ,
मगर किस्सा पुराना हो गया है । 
.
नमक रिश्तों में ज्यादा घुल गया था ,
तेरा जाना बहाना हो गया है । 
.
बहुत शीरीं हुआ लहजा तो जैसे ,
लता का एक गाना हो गया है । 
.
मैं उसकी याद में खोया हूँ जब भी ,
लगा मिलना मिलाना  हो गया है । 
.
ख़ुशी में माँ के आंसू मुझपे ढलके ,
मेरा गंगा नहाना हो गया है । .
.
मेरे घर में बुजुर्गों की है इज्ज़त ,
दुआओं का खजाना हो गया है । 
.
              - अभिनव अरुण 
                 [14052013]

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Comment

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Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on May 16, 2013 at 9:32am

आ0 अभिनव अरून जी,
’’ख़ुशी में माँ के आंसू मुझपे ढलके,
मेरा गंगा नहाना हो गया है।
मेरे घर में बुजुर्गों की है इज्ज़त,
दुआओं का खजाना हो गया है।’’
खूबसूरत गजल। वाह भाई जी, मन आल्हादित हो गया। ढेरों बधाईयां स्वीकारें। सादर,


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on May 15, 2013 at 10:10pm

हरेक शेर दमदार और रुहानी खुश्बू से लबरेज़.  हर शेर पर वाह !

माँ और लोरी वाले शेर में तो आपकी मनोवैज्ञानिक परख पर दंग हूँ. न-सोये बच्चे की क्या ही अहसास को उभारा है आपने, भाईजी.

इस ग़ज़ल के लिए बहुत-बहुत बधाइयाँ और दिल से दाद कह रहा हूँ.

Comment by राज लाली बटाला on May 15, 2013 at 7:42pm
नमक रिश्तों में ज्यादा घुल गया था ,
तेरा जाना बहाना हो गया है ।  wah bahut achhe Abhinav ji 
Comment by Abhinav Arun on May 15, 2013 at 10:39am

"भारतीय परम्पराओं को इंगित करती ये पंक्तियाँ" .. और लहजा आपको पसंद आया हार्दिक आभार श्री विजय जी !!

Comment by Abhinav Arun on May 15, 2013 at 10:38am

मेरी भावनाएं आपको अच्छी लगीं श्री सूबे सिंह जी बहुत ख़ुशी हुई शुक्रिया आपका !!

Comment by Abhinav Arun on May 15, 2013 at 10:24am

अहा आदरणीय वीनस जी पुरानी डायरी से टांक दिया है ... देखने को की क्या रिस्पोंस मिलता है । आपका स्नेह मिला सुखद लगा , आभार !!

Comment by Abhinav Arun on May 15, 2013 at 10:22am

आभार आदरणीया शालिनी कौशिक जी !!

Comment by shalini kaushik on May 15, 2013 at 1:59am

बहुत सुन्दर 

Comment by वीनस केसरी on May 15, 2013 at 12:48am
बहुत पुख्ता कलाम हुआ है जो कि रोज़ रोज़ नहीं होता ...
शाइस्तगी के तो क्या कहने
यूँ हर शेर शानदार है मगर इन तीनों को तो बार बार पढ़ा ...

बहुत शीरीं हुआ लहजा तो जैसे ,
लता का एक गाना हो गया है । 
.
मैं उसकी याद में खोया हूँ जब भी ,
लगा मिलना मिलाना  हो गया है ।

बयानों में तुम्हारे ताजगी है ,
मगर किस्सा पुराना हो गया है ।

ढेरों दाद ...
Comment by सूबे सिंह सुजान on May 14, 2013 at 10:59pm

बहुत सुन्दर...........

उसे देखे ज़माना हो गया है ,
मेरा बच्चा सयाना हो गया है । 
.
मेरा दिल गाँव में बसता है बेशक ,
शहर में आब - ओ - दाना हो गया है । 
.
तेरी पायल की रुनझुन बज रही माँ ,
तेरा लोरी सुनाना हो गया है । ................बधाी

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