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ग़ज़ल - मंडी से आढ़त तक सबकी पर्ची कटी हुई !

ग़ज़ल - 

कुछ होनी कुछ अनहोनी का मेला  ही तो है ,

ये जीवन क्या माटी का एक ढेला ही तो है ।

साँसों की झीनी चादर पर रिश्तों के गोटे ,

भीड़ में भी होकर  हर शख्स अकेला ही तो है ।

इस घर से उस घर तक जाने में रोना हँसना ,

सब कुछ गुड्डे गुड़ियों का एक खेला ही तो है ।

सुख दुःख का संगम तट ये तन और सारा जीवन ,

आशाओं  उम्मीदों का एक रेला ही तो है ।

सूली ऊपर सेज पिया की छूने को तत्पर ,

हर कबीर अपने उस पी का चेला ही तो है ।

बहर काफिया और रदीफ़ में उलझा उलझा सा ,

कहते जिसको शायर वो अलबेला ही तो है ।

मंडी से आढ़त तक सबकी पर्ची कटी हुई ,

देखो तो ये दुनिया भी एक ठेला ही तो है ।

                                       @ अरुण पाण्डेय "अभिनव"

                                                 [20052013 ]

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Comment by राज लाली बटाला on May 21, 2013 at 9:49pm

मंडी से आढ़त तक सबकी पर्ची कटी हुई ,

देखो तो ये दुनिया भी एक ठेला ही तो है । Bahut khoob Abhinav ji ! 

Comment by Abhinav Arun on May 21, 2013 at 2:23pm

आदरणीय श्री विजय जी हार्दिक रूप से आभार !!

Comment by राजेश 'मृदु' on May 21, 2013 at 12:59pm

आनंद आ गया इस गजल को पढ़कर, हार्दिक बधाई आपको, सादर


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on May 21, 2013 at 12:59pm

जय हो.. . क्या फ़लसफ़ाना अंदाज़ ले कर आये इस बार आप, भाई जी.. !

अश’आर छूते हुए जाते हैं. कथ्य में अलबत्ता क्लिशे है, लेकिन सुहाता है.  सभी शेर बतियाते हुए से हैं, जिसे मैं ग़ज़ल की पहली पहचान मानता हूँ.

तभी तो यह शेर एक्दम से भा गया. ..

मंडी से आढ़त तक सबकी पर्ची कटी हुई ,

देखो तो ये दुनिया भी एक ठेला ही तो है ।.. . . . ओह ! .. .

एक बात : 

मैं समझता हूँ आपने मिसरे में १३ गाफ़ लिये हैं.

Comment by विजय मिश्र on May 21, 2013 at 11:38am
"इस घर से उस घर तक जाने में रोना हँसना ,
सब कुछ गुड्डे गुड़ियों का एक खेला ही तो है ।"

--- गजल पढते-पढते बरबस एक आदर भाव हृदय में आपके लिए उमरा ,जिसे मैं आपको समर्पित कर रहा हूँ .भाव का गुढ़ और भाषा की सहजता प्रभावित करने को प्रयाप्त है .जो झंकृत करदे वही सफल रचना है .शुभेच्छा पाण्डेयजी .
Comment by बृजेश नीरज on May 21, 2013 at 10:20am

वाह, वाह! बहुत ही सुन्दर! मेरी ढेरों बधाई स्वीकारें।

Comment by shalini kaushik on May 21, 2013 at 12:55am
.सुन्दर
Comment by वीनस केसरी on May 21, 2013 at 12:31am

इस घर से उस घर तक जाने में रोना हँसना ,

सब कुछ गुड्डे गुड़ियों का एक खेला ही तो है ।


सुख दुःख का संगम तट ये तन और सारा जीवन ,

आशाओं  उम्मीदों का एक रेला ही तो है ।

क्या कहने, शानदार 

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on May 20, 2013 at 11:14pm

आ0 अभिनव अरून भाई जी, वाह! बहुत सुन्दर-

’सूली ऊपर सेज पिया की छूने को तत्पर,
हर कबीर अपने उस पी का चेला ही तो है ।’
शानदार भावों के लिए तहेदिल से हार्दिक बधाई स्वीकारे। सादर,

Comment by अरुन 'अनन्त' on May 20, 2013 at 10:58pm

वाह वाह अभिनव भाई जी वाह लाजवाब शानदार ग़ज़ल सभी के सभी अशआर शानदार धारदार हुए है खास कर ये कुछ ज्यादा पसंद आये. इनके लिए विशेष तौर पर हार्दिक बधाई स्वीकारें.

साँसों की झीनी चादर पर रिश्तों के गोटे ,

भीड़ में भी होकर  हर शख्स अकेला ही तो है ।

इस घर से उस घर तक जाने में रोना हँसना ,

सब कुछ गुड्डे गुड़ियों का एक खेला ही तो है ।  आहा वाह बेहद उम्दा

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