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स्वाभिमान से रहे तना हुआ

काल अग्नि युक्त है तृतीय नेत्र और शम्भु
कन्ठ कालकूट युक्त आपका बना हुआ
और माल भी भुजंग ही बने हुए अनेक
दंग हूँ शिवत्व किन्तु आपका घना हुआ
बाँटते रहे प्रसाद आप भक्त के निमित्त
सोम वृष्टि से कृतार्थ मुक्त-वेदना हुआ
आशुतोष भक्ति ध्यान में रहूँ रमा सदैव
और भाल स्वाभिमान से रहे तना हुआ
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य
लखनऊ

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Comment

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Comment by Dr Ashutosh Vajpeyee on May 27, 2013 at 10:10am

विजय जी, वन्दना जी, अशोक जी बहुत बहुत आभार 

Comment by Ashok Kumar Raktale on May 27, 2013 at 8:37am

आदरणीय डॉ. आशुतोष वाजपेयी जी सादर, बहुत सुन्दर गणात्मक घनाक्षरी किसी मन्त्र समान लगती है. बहुत बहुत बधाई स्वीकारें.रचना को जब स्वनाम मिले तब और इससे बड़ी उपलब्धि क्या होगी.इसकी अतिरिक्त बधाई स्वीकार करें.सादर.

Comment by Vindu Babu on May 25, 2013 at 7:59pm
आदरणीय शुभकामना करूंगी कि आपकी यह 'आशुतोष गणात्मक धनाक्षरी' साहित्य पथ पर चले ही नहीं दौड़े।
सादर बधाई आपको।
सादर
Comment by विजय मिश्र on May 23, 2013 at 11:57am
जय शिवशंकर गौरीशंकर पार्वती के पति उमापति महादेव की जय ,जय हो औढरदानी मंदारी की . भावातिरेकपूर्ण वन्दना और सुंदर स्तुति .
Comment by Dr Ashutosh Vajpeyee on May 23, 2013 at 8:25am

बहुत आभार लक्ष्मन प्रसाद जी 

Comment by Dr Ashutosh Vajpeyee on May 23, 2013 at 8:24am

राजेश कुमार झा जी यह गणात्मक घनाक्षरी है जिसे काव्याचार्य अशोक पाण्डेय 'अशोक' जी ने मेरा मौलिक प्रयोग जान कर आशुतोष गणात्मक घनाक्षरी छन्द नाम दिया है शैल्पिक व्यवस्था इस प्रकार है ---रगण जगण की ५ आवृत्ति के बाद एक गुरु........स्नेह हेतु बहुत बहुत आभार 

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on May 22, 2013 at 5:52pm

शिव भक्त अशुतौश जी भक्ति भाव में रमे सदैव 

भाल उनका तना रहे स्वाभिमान न डिगे कतैही 

Comment by राजेश 'मृदु' on May 22, 2013 at 3:08pm

आदरणीय, बहुत ही पुष्‍ट मनहरण घनाक्षरी (यदि मैं सही हूं) आपने प्रस्‍तुत किया है, सादर

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