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आशंकित सशंकित इंसान

लगा है निज आवरण बचाने में

जो बनाता रहा जीवन पर्यंत

कभी चाहे , कभी अनचाहे

जुटा है अपनी केंचुल बचाने में

जो दरकती जाती है

स्वत: ही समय के साथ

और कभी दूसरों के नोचने से ....................

"मौलिक व अप्रकाशित"

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Comment

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Comment by Ashok Kumar Raktale on June 8, 2013 at 9:51pm

आदरणीय रवि वर्मा जी इंसान की फितरत पर सुन्दर रचना की है सादर बधाई स्वीकारें.

Comment by Ashok Kumar Raktale on June 8, 2013 at 9:51pm

आदरणीय रवि वर्मा जी इंसान की फितरत पर सुन्दर रचना की है सादर बधाई स्वीकारें.

Comment by aman kumar on June 3, 2013 at 1:46pm

आपके प्रयास पर आपको बधाई!

Comment by विजय मिश्र on June 3, 2013 at 1:34pm
भावभरी मन को तृप्त करती कविता और अपने निहितार्थ में सम्पूर्ण . कभी-कभी तो ज्वालामुखी सा राई-छिया कर देता है बलात ओढा हुआ आवरण .बचना चाहिए .
Comment by coontee mukerji on June 3, 2013 at 1:40am

रवि जी , आप की छोटी सी रचना पर कितनी बड़ी समस्या की पर सोचने पर मजबूर कर देगी .......

जुटा है अपनी केंचुल बचाने में

जो दरकती जाती है

स्वत: ही समय के साथ

और कभी दूसरों के नोचने से ........सादर / कुंती

Comment by ram shiromani pathak on June 2, 2013 at 5:59pm

 सुन्दर भाव रचना////////हार्दिक बधाई 

Comment by DRx Ravi Verma on June 2, 2013 at 2:03pm

आप सभी के प्रोत्साहन एवं सुझाव का मैं आभारी हू ..

Comment by Dr Ashutosh Mishra on June 2, 2013 at 1:42pm

मन को छूने वाली शसक्त रचना ..ऐसा लग रहा है जैसे बोर में पहले पानी डाला जाता है तो फिर पानी निकलने लगता है ..तुम्हारी रचना  पाठक के पम्प में डाला ऐसा ही पानी है जो पाठक को बहा से कविता शुरू करने के लिए प्रेरित करता है जहाँ से तुम अपनी कविता को अदृश्य करते हो ..बहुत सारी बधाई के साथ 

Comment by aman kumar on June 2, 2013 at 11:33am

.अति सुंदर !

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on June 2, 2013 at 10:31am

संक्षिप्त पर सुन्दर भाव रचना के लिए हार्दिक बधाई और इस मंच पर प्रथम रचना पढने हेतु स्वागत 

कृपया ध्यान दे...

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