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ज़िंदगी इतने दिन तूफ़ान रही,

कभी बारिश,कभी मुस्कान रही 

मिर्च थी खूब,मसाले भी बहुत

सौदा-सुलुफ की ये दुकान रही 

लोग चेहरे लगाये ,आये ,गए 
कौन रिश्ते थे बस पहचान रही 

आसमां पर निरी सलाखें थीं 

अपनी आँगन में ही उड़ान रही 

खूब ढोया है उम्र को हमने 
इसलिए दोस्त,कुछ थकान रही 
____________प्रो.विश्वम्भर शुक्ल 
लखनऊ 

(अप्रकाशित और मौलिक रचना )

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Comment

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Comment by वीनस केसरी on June 19, 2013 at 9:59am

प्रो साहब सुन्दर गीतिका के लिए हार्दिक बधाई स्वीकारें 

हाँ 
कभी बारिश,कभी मुस्कान रही ...

मुस्कान के साथ बारिश का कंट्रास्ट नहीं आ पा रहा है
इस पर गौर करें 

Comment by vijayashree on June 14, 2013 at 8:53pm

खूब ढोया है उम्र को हमने 
इसलिए दोस्त,कुछ थकान रही 

 

सुंदर प्रस्तुति .... हार्दिक बधाई

Comment by coontee mukerji on June 14, 2013 at 1:16am

बहुत गम्भीर रचना / सादर / कुन्ती

Comment by डा॰ सुरेन्द्र कुमार वर्मा on June 13, 2013 at 7:32pm

बहुत सुन्दर रचना, बधाई! पढ़ते हुए कुछ ऐसा भी लगा (क्षमा सहित... ):

      "लोग चेहरे लगाये ,आये ,गए, कौन रिश्ते थे बस पहचान रही 
       खूब ढोया है उन को हमने
 इसलिए दोस्त,कुछ थकान रही" . (ये सुझाव नहीं, मेरी प्रतीति है जो पढ़ते हुए मुझे हुई)

Comment by बृजेश नीरज on June 12, 2013 at 10:19pm

बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति! आपको ढेरों बधाई!

Comment by विजय मिश्र on June 12, 2013 at 6:14pm

" आसमां पर निरी सलाखें थीं 

अपनी आँगन में ही उड़ान रही "--- उठा-पटक के बीच यह सीमांकन भा जाता है . बधाई .

Comment by राजेश 'मृदु' on June 11, 2013 at 6:15pm

वाह-वाह आदरणीय बहुत ही बढि़या । इस मंच पर आपकी प्रथम रचना पढ़ रहा हूं पर अन्‍यत्र आपका लिखा बहुत कुछ पढ़ा है, एक-दो अपने मशहूर ठुक्‍तक भी दें तो आनंद आ जाए, सादर

Comment by Shyam Narain Verma on June 11, 2013 at 4:55pm

सुदर अभिव्यक्ति............................

Comment by वीनस केसरी on June 11, 2013 at 11:33am

सुन्दर प्रस्तुति 

हार्दिक आभार एवं शुभकामनाएं 

Comment by Abid ali mansoori on June 11, 2013 at 11:25am
वाह..विश्वम्भर जी एक अजीब सी कशिश है आपकी रचना मेँ जो दिल मेँ उतर गई!

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