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दास्ताँ इक तुम्हे सुनानी है

दास्ताँ इक तुम्हे सुनानी है

आज पीने को मय पुरानी है 

मेरी आँखों में सूनापन सा है

सूनेपन की कोई कहानी है

राजा रानी हों जरूरी तो नहीं

इक कहानी तो बस कहानी है

आँखों आँखों से बात की जाए

आज तबियत जरा रूमानी है

बिखरी साँसें यहाँ फिजाओं में

गुमशुदा इनमे इक जवानी है

मेरी आँखों में झांककर देखो

इसमें पागल कोई दीवानी है

तेरी राहों में फूल जैसे बिछे

तू कदम रख दे मेहरवानी है

तू नहीं है तो कोई रंज नहीं

पास मेरे तेरी निशानी है

जाम ठुकरा के न जाओ “आशु”

कतरे-कतरे में जिंदगानी है

(मौलिक व अप्रकाशित) 

डॉ आशुतोष मिश्र , आचार्य नरेन्द्र देव कॉलेज ऑफ़ फार्मेसी बभनान,गोंडा, उत्तरप्रदेश मो० ९८३९१६७८०१

 

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Comment by Sumit Naithani on June 12, 2013 at 12:44pm

आँखों आँखों से बात की जाए

आज तबियत जरा रूमानी है

बिखरी साँसें यहाँ फिजाओं में

गुमशुदा इनमे इक जवानी है..............बहुत सुन्दर..

Comment by Roshni Dhir on June 12, 2013 at 12:14pm

वाह वाह बहुत खूब डा० साहिब जी 

राजा रानी हों जरूरी तो नहीं

इक कहानी तो बस कहानी है..

बहुत बढिया गज़ल कही ..

बधाई 

Comment by aman kumar on June 12, 2013 at 10:04am

मेरी आँखों में सूनापन सा है

सूनेपन की कोई कहानी है

मेरी आँखों में सूनापन सा है

सूनेपन की कोई कहानी है

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on June 12, 2013 at 12:13am
आदरणीय..आशुतोष जी, बहुत ही खूबसूरत पंक्तिया "तू नहीं है तो कोई रंज नहीं है, पास मेरे तेरी निशानी है " .....हार्दिक शुभकामनाऐं

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