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देश में फल-फूल रहा, सट्टे का बाजार,

कुछ लोगो के बिक रहे,देखो सब घर बार |

 

सट्टा गर सरकार का, नियमो में वह वैध

जनता गर सट्टा करे, उसको कहे अवैध |

 

राजनीति व्यवसाय है,दीमक जैसी चाट

घोटाले करते रहे,  कुर्सी के है  ठाट |

 

राजनीति में जो सफल,घोटालो में लिप्त, 

इस धंधे में देख लो,नेता सब संलिप्त |

 

बहुत संपदा पास में, कल तक तो थे रिक्त  

नित्य संपदा बढ रही, सुविधाएँ अतिरिक्त |

 

सुविधाए सब ले रहे, संसद करते ठप्प,

जिस दिन संसद चल पड़े,खूब लड़ाते गप्प | 

.

(मौलिक व् अप्रकाशित)

-लक्ष्मण प्रसाद लडीवाला

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Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on July 14, 2013 at 9:47am

बहुत बहुत आभार श्री अशोक रक्ताले साहब, तीसरे दोहे को बदल्लने का प्रयास करूंगा 

Comment by Ashok Kumar Raktale on July 14, 2013 at 12:34am

आदरणीय लड़ीवाला साहब सादर, सुन्दर दोहे कहे हैं. बहुत बहुत बधाई स्वीकारें.हाँ तीसरे दोहे में मजा नहीं आया.

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on July 13, 2013 at 9:33am

साहित्य में व्यंग रूप में बात कहने का अपना महत्व है आदरणीय विजय निकोरे जी, पर जोरदार यंग के जरीय समाज 

को चेताने के लये लिखने का साहस अब कम करते है | आपकी सराहना से मन में और द्रद्ता आई है | हार्दिक आभार |

Comment by vijay nikore on July 13, 2013 at 9:29am

ऐसा व्यंग आजकल कम ही पढ़ने को मिलता है। बधाई, आदरणीय।

सादर,

विजय निकोर

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on July 13, 2013 at 9:21am

मजेदार है व्यंग ये, आभार  श्री बृजेश

मदारी जैसे लगते, अनपढ़ दे सन्देश |  

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on July 13, 2013 at 9:16am

दोहे सार्थक बन पड़े, मेरा प्रयास सार्थक हुआ, हार्दिक आभार आपका आदरणीया राजेश कुमारी जी 

Comment by बृजेश नीरज on July 12, 2013 at 10:50pm

मजेदार है! बधाई!


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on July 12, 2013 at 6:25pm

बहुत सार्थक दोहे बहुत बहुत बधाई 

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on July 12, 2013 at 3:32pm

ये तो मोटी चमड़ीवाले है भाई श्री राजेश कुंर झा साहब, इनको फर्क नहीं पड़ता, अपनी ही कलम घिसाई होनी है |

 दोहें पसंद करने के लिए हार्दिक आभार स्वीकारे 

Comment by राजेश 'मृदु' on July 12, 2013 at 3:19pm

बढि़या ठोंका है आपने, सादर

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