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कुछ दरीचा हो यहाँ पर

भूख थी जेरे बह्स  और प्यास भी था मुद्द'आ 

फैसला होना नहीं था, मुल्तबी वह फिर हुआ 

 

रहमतों की बारिशें होंगी, मुनादी हो गयी 

और बातें छोडिये, पर रोटियों का क्या हुआ

 

लाख बोलो  कान पर,जूँ  तक नहीं अब रेंगता 

क्या असर होगा इन्हें, दो गालियाँ  या बददुआ

 

हाथ इनके हैं बहुत लम्बे, मगर डरना  नहीं  

चाहे  संसद में गढ़ें वो नामुआफ़िक मजमुआ 

 

वारदातें भी रहम की मांगती हैं  हर नज़र

कुछ दरीचा हो यहाँ पर, हर तरफ खुलता हुआ  

 

मौलिक और अप्रकाशित 

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Comment by राजेश 'मृदु' on July 17, 2013 at 5:37pm

रहमतों की बारिशें होंगी, मुनादी हो गयी 

और बातें छोडिये, पर रोटियों का क्या हुआ

बहुत ही उम्‍दा कहा है आपने,सादर

Comment by विजय मिश्र on July 17, 2013 at 1:16pm
वजा फरमाया ललितजी ,गालियाँ और बद्दुआएँ भी बेअसर हैं इन जालीमों पर , इन्हें छौंक से छीक नहीं आने वाली , बड़ी बेहूदी और बदजात नस्ल है ये .

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