!!! दुर्मिल सवैया !!! ......8 सगण
बदरा बरसे हरषे धरती, नदिया-सर-खेत भरे जल से।
वन-बाग झकोर हवा पहिरे, फल जामुन-आम पके जल से।।
हर ओर घटा घन घोर घिरी, मन-मोर-चकोर कहे जल से।
विरही मन नारि छली मचली, नहि प्यास बुझे बरखा जल से।।
के0पी0सत्यम/ मौलिक एवं अप्रकाशित
Comment
आ0 अरून अनन्त भाई जी, आपके स्नेह और अनुमोदन हेतु आपका हार्दिक आभार। सादर,
आ0 सौरभ सर जी, आपके अपार स्नेह और अनुमोदन हेतु आपका हार्दिक आभार। सादर,
आ0 राजकुमारी जी, आपके स्नेह और अनुमोदन हेतु आपका हादिर्क आभार। सादर,
आदरणीय केवल भाई जी बहुत ही सुन्दर प्रयास हुआ है आनंद आ गया भाई बहुत बहुत बधाई स्वीकारें.
सुन्दर छंद-रचना
प्रयासरत रहें..
बधाई
वाह बरसात ऋतु का कितना सुन्दर द्रश्य खींचा है इस छंद में बहुत सुन्दर बधाई आपको
आ0 लड़ीवाला सर जी, आपके स्नेह व उत्साहवर्धन हेतु आपका तहेदिल से बहुत बहुत आभार। सादर,
आ0 संदीप भाई जी, आपके स्नेह व उत्साहवर्धन हेतु आपका तहेदिल से बहुत बहुत आभार। सादर,
मन भावन दुर्मिल सवैया पढ़ कर प्रसन्नता हुई श्री केवल प्रसाद जी, बधाई स्वीकारे
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