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नव निशा की बेला लेकर,

साँझ सलोनी जब घर आयी।

पूछा मैंने उससे क्यों तू ,

यह अँधियारा संग है लायी॥

सुंदर प्रकाश था धरा पर,

आलोकित थे सब दिग-दिगंत।

है प्रकाश विकास का वाहक,

क्यों करती तू इसका अंत॥

जीवन का नियम यही है,

उसने हँसकर मुझे बताया।

यदि प्रकाश के बाद न आए,

गहन तम की काली छाया॥

तो तुम कैसे जान सकोगे,

क्या महत्व होता प्रकाश का।

यदि विनाश न हो भू पर,

तो कैसे हो परिचय विकास का॥

दुख के भय से सुख की पूजा,

नफरत से अस्तित्व प्यार का।

इसीलिए तो हे प्रिय ‘दर्पण’,

परिवर्तन नियम संसार का॥

(सर्वथा मौलिक एवं अप्रकाशित-प्रदीप बहुगुणा ‘दर्पण’)

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Comment

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on August 2, 2013 at 4:50pm

बहुत सही.

प्रयासरत रहें .. रचनाएँ पढ़ें और उन्हें समझने की कोशिश करें 

वैसे

नव निशा की बेला लेकर,

साँझ सलोनी जब घर आयी... इन पंक्तियों के माने क्या हुए ?

शुभेच्छाएँ

Comment by बृजेश नीरज on July 31, 2013 at 10:34pm

बढ़िया है। इस प्रयास पर आपको हार्दिक बधाई!

Comment by Dr Ashutosh Mishra on July 31, 2013 at 4:44pm

दुख के भय से सुख की पूजा,

नफरत से अस्तित्व प्यार का।

इसीलिए तो हे प्रिय ‘दर्पण’,

परिवर्तन नियम संसार का...........andhkaar n hota to sachumuch prakash kee keemat pata nahee chaltee ...behtaree saadar badhayee 

Comment by अरुन 'अनन्त' on July 30, 2013 at 3:38pm

प्रदीप भाई जी प्रयास बहुत सुन्दर है बधाई स्वीकारें

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on July 30, 2013 at 12:08pm

बहुत सुन्दर भाव लिए अच्छी रचना हुई है भाई श्री रवि प्रकाश जी | सुख की अनुभूति उसे नहीं हो सकती जिसने  पहले 

कष्ट नहीं उठाये हो | इसी प्रकार अँधेरे से उजाले में आने पर ही उजाले का अहसास होता है | हार्दिक बधाई 

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on July 29, 2013 at 12:11am

आदरणीय प्रदीप जी, सुंदर सरल रचना प्रस्तुति पर, हार्दिक बधाई

कृपया ध्यान दे...

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