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वज्न- 2122 1212 112

 

कब से बेकल है ये बहार बहुत

रोज़ो-शब तेरा इंतज़ार बहुत

 

इश्क कामिल न हो सका किसी का

आये दुन्या में जाँनिसार बहुत

 

रंग लायेगा आशिकी का जुनूँ   

सुर्ख है अब के रसनो-दार बहुत

 

आदमीयत से है गुरेज़ जिन्हें

अम्न गुज़रे है नागवार बहुत

 

हक़ के बदले में जान का सौदा

इस ज़माने में है ये कार बहुत

 

 

कामिल =पूरा

जाँनिसार =दूसरों के लिये प्राणों की आहूति देने वाला

रसनो-दार =सूली और पाश

गुरेज़= घृणा

कार =पेशा

 

-मौलिक व अप्रकाशित

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on August 11, 2013 at 2:32pm

आदमीयत से है गुरेज़ जिन्हें

अम्न गुज़रे है नागवार बहुत ...   

बहुत बहुत दाद कुबूल करें, भाईजी.. . 

Comment by Abhinav Arun on August 7, 2013 at 5:47pm

ग़ज़ल अच्छी है हार्दिक बधाई आदरणीय

Comment by vijay nikore on August 7, 2013 at 10:47am

बहुत सुन्दर भाव पिरोए हैं, आदरणीय शिज्जू जी।

 

सादर,

विजय निकोर

Comment by Ketan Parmar on August 5, 2013 at 12:45pm

umda kahan choti behr me

Comment by Ketan Parmar on August 5, 2013 at 12:45pm

हक़ के बदले में जान का सौदा

इस ज़माने में है ये कार बहुत

Bahut umda Sher hai saahab badhaai

Comment by Vinita Shukla on August 4, 2013 at 7:57pm

सुन्दर भाव, अच्छा प्रयास. बधाई.

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on August 4, 2013 at 7:47pm

हक़ के बदले में जान का सौदा

इस ज़माने में है ये कार बहुत........वाह ! बहुत खूब, क्या कहने

बहुत सुंदर ! हार्दिक बधाई आपको, आदरणीय शिज्जू जी

 

Comment by बृजेश नीरज on August 4, 2013 at 6:36pm

वाह! बहुत खूबसूरत! आपको बहुत बधाई!

Comment by MAHIMA SHREE on August 4, 2013 at 2:16pm

रंग लायेगा एक रोज़ जुनूँ

सुर्ख है अब के रसनो-दार बहुत.. वाह बहुत ही बढ़िया आदरणीय शिज्जू जी बधाई आपको


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Rana Pratap Singh on August 3, 2013 at 9:10pm

ओह ....मुझे माफ़ कीजिये..मुझसे ही चूक हुई| दोनों मिसरे बा बह्र हैं|

कृपया ध्यान दे...

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