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देहरी पर मन के

किसने रख दिए दो पाँव,

बस गया दो पल में जैसे

एक सुन्दर गाँव!

 

गुप्तचर आँखों ने ढूंढें

रूप के कुछ ठौर,

मन अपेक्षी हर कदम

कहता रहा, कुछ और.

कब मिले जाने इसे अब

कोई अंतिम ठांव!

 

चितवनों के गाँव में

बिखरे अगिन संकेत,

किन्तु जल की आड़ में

छलती गयी है रेत.

रूपसी खेलेगी मुझसे 

और कितने दांव!

 

ले नदी सब नीर अपना

चल पड़ी किस ओर,

चंचला लहरों ने थामी

चांदनी की डोर.

झिलमिलाती चल रही है

ज़िंदगी की नाव!

"मौलिक व अप्रकाशित"

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Comment

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on August 11, 2013 at 9:28pm

वाह वाह .. .

इस उन्नत भाव-दशा को इतने सार्थक शब्द मिले हैं कि मन मुग्ध है.

मन की देहरी पर ठिठके किन्हीं दो पाँवों की यात्रा जो प्रारम्भ होती है वो उत्तरोत्तर रोचक होती चली जाती है. लेकिन कई बिम्ब एकदम से रोकते हैं और मन देर तक उनके गिर्द झूमता है. इस दुलकी यात्रा के दौरान दृश्यों का सुन्दर रुपायन होता है, भाईजी.

बहुत बहुत बधाई स्वीकार करें.

शुभम्


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Rana Pratap Singh on August 6, 2013 at 9:51pm

बहुत सुन्दर गीत 

गीत के स्थाई में कही गई बात को अंतरे ने और आगे बढाया| बिम्बों और संकेतों ने गीत को नै उंचाइयां दी हैं|

हार्दिक बधाई|

मंच पर गीतों की बयार चल पड़ी है ..मैं अभिभूत हूँ|

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on August 6, 2013 at 5:12pm

आपके स्रजनात्मक जीवन की नाव यूँ ही चलती रहे,सुन्दर भाव लिए कविता बनती रहे श्री सौरभ श्रीवास्तव जी

हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाए  

Comment by अरुन 'अनन्त' on August 6, 2013 at 10:30am

वाह आदरणीय सौरभ जी बेहद सुन्दर भावाविभक्ति बेहद सुन्दर पंक्तियाँ इस सुन्दर गीत पर दिल से बधाई स्वीकारें.

चंचला लहरों ने थामी

चांदनी की डोर. इन पंक्तियों पर विशेष तौर से बधाई स्वीकारें आदरणीय

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on August 6, 2013 at 9:27am

आदरणीय सौरभ श्रीवास्तव जी,

सुंदर , सहज रचना पर आपको हार्दिक बधाई


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on August 6, 2013 at 9:21am

बहुत सुन्दर सहज शब्द चयन, सुन्दर भाव, सुप्रवाहित गठन...हार्दिक बधाई इस सुन्दर सृजन के लिए.

शुभकामनाएँ 

Comment by वेदिका on August 6, 2013 at 8:49am

ले नदी सब नीर अपना

चल पड़ी किस ओर,

चंचला लहरों ने थामी

चांदनी की डोर.

झिलमिलाती चल रही है

ज़िंदगी की नाव!

प्राकृतिक बिम्बों का सहारा लेकर मन की सारी बात कह डाली,,, सुंदर सुंदर

शुभकामनाये आदरणीय सौरभ जी! 

Comment by Pankaj Trivedi on August 6, 2013 at 7:49am

अदभूत गीत ! वाह !  एक सुन्दर गाँव ...

Comment by Abhinav Arun on August 6, 2013 at 4:58am

बहुत सुन्दर आनंदित हूँ ऐसा गीत पढके श्री सौरभ जी , बहुत बहुत बधाई इस सशक्त सृजन पर --

चितवनों के गाँव में

बिखरे अगिन संकेत,

किन्तु जल की आड़ में

छलती गयी है रेत.

रूपसी खेलेगी मुझसे 

और कितने दांव!

क्या मंज़र कशी है वाह वाह बेहद उम्दा !!

Comment by विवेक मिश्र on August 6, 2013 at 12:17am
अहा। क्या सुन्दर गीत हुआ है। मुखड़ा सुनकर ही प्रभावित हुए बिना नहीं रहा जा सकता। तिस पर लय ऐसी कि पूरा गीत एक सांस में पढ़ गया। इस भावपूर्ण सृजन के लिए हार्दिक बधाई।

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