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गज़ल - नजरों को नजारे मिल गये // वेदिका

वज्न / २१२२ २१२२ २१२ 

चाह थी जिनकी, हमारे मिल गये 

गुम कहीं थे ख्वाब, सारे मिल गये.

 

एक धागा बेल के धड़ से मिला 

बेसहारों को सहारे मिल गये 

.

हम अकेले, भीड़ थी, तन्हाई थी 

और तुम बाहें पसारे मिल गये

.

डूबती नैया के तुम पतवार हो 

साथ तेरे हर किनारे मिल गये 

.

देख तुमको, जी को जो ठंडक हुयी 

यूँ कि नजरों को नजारे मिल गये 

.

सच अगरचे, देख के अनदेख हो 

झूठ जीतेगा, इशारे मिल गये    

                  

                             गीतिका ‘वेदिका’      

 

मौलिक / अप्रकाशित 

 

 

 

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Comment

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Comment by वेदिका on August 7, 2013 at 9:07am

आभार आदरणीय बृजेश जी! 

Comment by वेदिका on August 7, 2013 at 9:06am

आभार आदरणीय अरुण जी! 

यह बारीक सुझाव मुझे देने के लिए मै आपकी शुक्र गुजार हूँ,,  

आभार आपका 

Comment by seema agrawal on August 7, 2013 at 12:50am

बहुत सुन्दर ग़ज़ल गीतिका जी सभी शेर बढ़िया हए हैं पर ....

सच अगरचे, देख के अनदेख हो 

झूठ जीतेगा, इशारे मिल गये  ...........इस शेर में जिस मासूमियत से कड़वी सच्चाई बयान हुयी है उसका जवाब नहीं ...हार्दिक बधाई 

Comment by बृजेश नीरज on August 6, 2013 at 11:34pm

बहुत ही सुन्दर! लाजवाब! आपको हार्दिक बधाई!

आपकी रचना का सबसे सुन्दर शेर-

//हम अकेले, भीड़ थी, तन्हाई थी 

और तुम बाहें पसारे मिल गये//

और सबसे कमजोर शेर-

//एक धागा बेल के धड़ से मिला 

बेसहारों को सहारे मिल गये// 

 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by अरुण कुमार निगम on August 6, 2013 at 11:00pm

आदरणीया गीतिका जी, शानदार गज़ल के लिये बधाइयाँ स्वीकार कीजिये.हर शेर लाजवाब है.

डूबती नैया के तुम पतवार हो 

साथ तेरे हर किनारे मिल गये

आदरणीया एक ही रचना / गीत / गज़ल में  तुम और तू (तेरे) का प्रयोग उचित नहीं माना जाता है. कृपया ऐसे प्रयोगों से परहेज करें

Comment by वेदिका on August 6, 2013 at 9:46pm

आदरणीय राणा प्रताप जी! 

गज़ल पर आपकी उपस्थिति मेरे लिए प्रेरणादायी है !

साभार !!

Comment by वेदिका on August 6, 2013 at 9:45pm

स्नेही आशीष जी! 

गज़ल पर दृष्टिपात करने हेतु मै आपकी आभारी हूँ !!

सादर !!

Comment by वेदिका on August 6, 2013 at 9:44pm

आदरणीय केवल प्रसाद जी! 

आपका आभार आपने रचना कर्म को उत्साहित किया !!

Comment by वेदिका on August 6, 2013 at 9:44pm

आदरणीय श्याम नारायण जी!

आपका आभार आपने रचना पसंद की 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Rana Pratap Singh on August 6, 2013 at 9:29pm

हम अकेले, भीड़ थी, तन्हाई थी 

और तुम बाहें पसारे मिल गये 

ख़ूबसूरत शेर| बधाई हो|

कृपया ध्यान दे...

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