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//गज़ल// सार रेशमी डोरी में- कल्पना रामानी

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छिपा हुआ रक्षाबंधन का, सार रेशमी डोरी में।

गुंथा हुआ भाई बहना का, प्यार रेशमी डोरी में।

 

कहीं बसे बेटी लेकिन, हर साल मायके आ जाती,

सजी धजी लेकर सारा, अधिकार रेशमी डोरी में।

 

बड़ा सबल होता यह रिश्ता, स्वस्थ भाव, बंधन पावन,

गहन विचारों का होता, आधार रेशमी डोरी में।

 

विदा बहन होती जब कोई, एक वायदा ले जाती,

जुड़े रहेंगे मन के सारे, तार रेशमी डोरी में।

 

विनय यही हों दृढ़ जीवन में, ये सदैव रिश्ते नाते,

रहे चमकता सतरंगी, संसार रेशमी डोरी में।  

 

 मौलिक व अप्रकाशित

 

कल्पना रामानी

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Comment

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Comment by कल्पना रामानी on September 1, 2013 at 9:52am

आदरणीय सौरभ जी, मैं भी आपके विचार से पूरी तरह से सहमत हूँ। इस तरह की रचनाएँ मेहनत अधिक माँगती हैं, लेकिन नया पाने की ललक में वो बात गौण हो जाती है। पाठक भी तो नवीनता ही चाहते हैं न। और अगर कहन में अटकाव या असुविधा न हो तो यह दोष भी गौण है। इस दोष पर तो मेरा ध्यान टिप्पणी के बाद ही गया। पढ़ने में असुविधा होती तो उसी समय बदलाव हो जाता।

आपकी टिप्पणी से मेरे साथ साथ समस्त जिज्ञासु पाठकों को भी अवश्य लाभ होगा।

आपका हृदय से आभार। सादर।


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on August 27, 2013 at 12:45am

आपकी ग़ज़ल जिस सहुलियत की मांग करती है वह आपने उसे दी. यह तो हुई पहली बात आदरणीया कल्पनाजी.

बह्र की अपनी सूची है लेकिन क्या मिसरे उसके अलावे अन्य विन्यास में नहीं होने चाहिये ? यह प्रश्न अनावश्यक है, यदि हर मिसरे एक विन्यास पर हों और उनकी गेयता और लय में बाधा न आये. आगे, सोचने, समझने और निभाने की बात है. 

आपकी ग़ज़ल प्रस्तुति कमाल की हुई है.  

सादर बधाइयाँ.. .

ऐबे तनाफ़ुर को लेकर इसी मंच पर बहुत लम्बी वार्ताएँ हुई हैं. हम उनका लाभ उठा सकते हैं. यह काव्य संप्रेषण में एक दशा है जिसका होना परिस्थितियों पर निर्भर करता है. 

सादर

Comment by कल्पना रामानी on August 22, 2013 at 10:22pm

केतन जी, मैंने जिस बहर में गजल कही है, वो साथ में ही संलग्न है।  जहाँ तक मुझे मालूम है बहर के निश्चित प्रकार नहीं होते। हम जिस छंद या बहर में मतले का शेर कहते हैं उसका निर्वाह पूरी गजल में होना चाहिए। प्रवाह बाधित न हो यह पहली शर्त होती है। जो दोष  आदरणीय शिज्जु जी ने बताया है, उस तरफ मेरा ध्यान भी टिप्पणी के बाद ही गया है।उनकी शंका बिलकुल सही है। लेकिन गजल कहते समय मुझे कोई अटकाव महसूस नहीं हुआ इसलिए ध्यान भी नहीं गया। इसमें सुधार की तो कोई गुंजाइश ही नहीं है। इसे या तो यूँ ही रहने दिया जाए या हटा दिया जाए। तीसरा कोई विकल्प नहीं है। बाकी बहर के बारे में जब गुरुजन टिप्पणी करेंगे तभी स्पष्ट हो सकेगा। मुझे स्वयं अधिक अनुभव नहीं है। अभी सीख ही रही हूँ। सादर

 

Comment by कल्पना रामानी on August 22, 2013 at 10:12pm

आदरणीय केवल प्रसाद जी,  विनीता जी, केतन जी, जितेंद्र जी, आप सबका हार्दिक आभार

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on August 21, 2013 at 3:58am

विदा बहन होती जब कोई, एक वायदा ले जाती,

जुड़े रहेंगे मन के सारे, तार रेशमी डोरी में।............बहुत ही हृदयस्पर्शी शेर

रक्षाबंधन पर्व पर गजल प्रस्तुति हेतु आपको बहुत बधाई आदरणीया कल्पना जी 

Comment by Ketan Parmar on August 20, 2013 at 11:11pm
sawaal ka javaab kalpana didi se hi apekshit hai. didi rakshabandhan ki subhkamnaaye
Comment by Ketan Parmar on August 20, 2013 at 11:10pm
bhaav achhe hai magar behr samajh nahi aayi didi roshani daale uspar
Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on August 20, 2013 at 10:04pm

आ0 रामानी दी जी,  सादर प्रणाम!     एक सुन्दर, कोमल, स्नेह से परिपूर्ण पवित्र पर्व पर लाजवाब संदेश और भाव भरे हैं।  आपको तहेदिल बहुत-बहुत बधाई, लेकिन बह्र के सम्बन्ध में वरिष्ठजन ही मार्ग दर्शन करें तो बेहतर होगा। सादर  

Comment by Vinita Shukla on August 20, 2013 at 9:54pm

बहन, भाई के प्रेम से पगी, सुंदर, समसामयिक पोस्ट. बधाई आदरणीया.

Comment by कल्पना रामानी on August 20, 2013 at 9:37pm

आदरणीया प्राची जी, सराहना के लिए हार्दिक धन्यवाद आपका

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