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मंगल मूरत गणपति देवा//गज़ल//-कल्पना रामानी

 

 देवों में जो पूज्य प्रथम है, सबके शीघ्र सँवारे काम।

मंगल मूरत गणपति देवा, है वो पावन प्यारा नाम।

 

भक्ति भरा हर मन हो जाता, भादों शुक्ल चतुर्थी पर,

सुंदर सौम्य सजी प्रतिमा से, हर घर बन जाता है धाम।

 

भोग लगाकर पूजा होती, व्रत उपवास किए जाते,

गणपति जी की गाई जाती, आरति मन से सुबहो शाम।

 

चल पड़ती  जब सजकर झाँकी, ढ़ोल मँजीरे साथ लिए,

झूम उठता यौवन मस्ती में, और सड़क पर लगता जाम।

 

फिर फिर से हर साल विराजें, देव यही अभिलाषा है,

विनती हो स्वीकार हमारी, करते  बारम्बार  प्रणाम।

 

मौलिक व अप्रकाशित

 

कल्पना रामानी  

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Comment

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Comment by कल्पना रामानी on September 15, 2013 at 3:55pm

आदरणीय अरुण अनंत जी, सुंदर टिप्पणी के लिए हार्दिक धन्यवाद

Comment by कल्पना रामानी on September 15, 2013 at 3:55pm

आदरणीय प्राची जी, रचना पर आपकी उपस्थिती से बहुत हर्ष हुआ। हार्दिक धन्यवाद आपका

Comment by अरुन 'अनन्त' on September 11, 2013 at 11:16pm

वाह आदरणीया वाह आनंद आ गया कितनी सुन्दर सरस हृदयस्पर्शी ग़ज़ल कही है आपने दिल से दाद कुबूल फरमाएं.


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on September 11, 2013 at 4:58pm

गणपति को समर्पित बहुत खूबसूरत गज़ल 

हार्दिक बधाई आदरनीया कल्पना रामानी जी 

Comment by कल्पना रामानी on September 10, 2013 at 10:05pm

आदरणीय मित्रों, केवलप्रसाद जी, जवाहरलालजी,गिरिराज जी,विजयश्री जी, वंदना जी, विजय मिश्र जी आप सबका सुंदर टिप्पणियों के लिए हार्दिक धन्यवाद।

सादर

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on September 10, 2013 at 9:36pm

आ0 रामानी जी,  वाह! वाह! बेहतरीन गजल।  ढेरो बधाईयां स्वीकारें।  सादर,   

Comment by JAWAHAR LAL SINGH on September 10, 2013 at 8:29pm

जय जय जय श्री गणपति देवा . गणेश चतुर्थी की अनेक शुभकामनाएँ! विघ्नहर्ता हम सबका कल्याण करें!


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on September 10, 2013 at 6:35pm

वाह वाह !! क्या बात है !! आदरणीया कल्पना जी , सुन्दर सामयिक रचना केलिये बधाई !

Comment by विजय मिश्र on September 10, 2013 at 6:28pm
जय जय जय श्री गणपति देवा . गणेश चतुर्थी की अनेक शुभकामनाएँ ,मंगलमूर्ति द्वार बिराजें सफल करें सब काज | सुंदर वन्दना हेतु साधुवाद .
Comment by vandana on September 10, 2013 at 6:35am

फिर फिर से हर साल विराजें, देव यही अभिलाषा है,

विनती हो स्वीकार हमारी, करते शत-शत बार प्रणाम।

बहुत ही सुन्दर भाव आदरणीया कल्पना मैम

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