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गीत: निज मन से हांरे हैं... -- संजीव 'सलिल'

गीत:
निज मन से हांरे हैं...
संजीव 'सलिल'
*
कौन, किसे, कैसे समझाये
सब निज मन से हारे हैं.....
*
इच्छाओं की कठपुतली हम
बेबस नाच दिखाते हैं.
उस पर भी तुर्रा यह, खुद को
तीसमारखां पाते हैं.
रास न आये सच कबीर का
हम बुदबुद-गुब्बारे हैं.....
*
बिजली के जिन तारों से
टकरा पंछी मर जाते हैं.
हम नादां उनका प्रयोग कर,
घर में दीप जलाते हैं.
कोई न जाने कब चुप हों
नाहक बजते इकतारे हैं.....
*
पान, तमाखू, ज़र्दा, गुटका,
खुद खरीदकर खाते हैं.
जान हथेली पर रखकर-
वाहन जमकर दौड़ाते हैं.
'सलिल' शहीदों के वारिस या
दिशाहीन बंजारे हैं.....
*********************
.



Views: 418

Comment

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Comment by Bhasker Agrawal on December 23, 2010 at 8:18am

इच्छाओं की कठपुतली हम
बेबस नाच दिखाते हैं.
उस पर भी तुर्रा यह, खुद को
तीसमारखां पाते हैं.

ये लाइंस तो कुछ ज्यादा ही कमाल हैं...मज़ा आ गया
Comment by Rash Bihari Ravi on December 22, 2010 at 6:57pm

बिजली के जिन तारों से
टकरा पंछी मर जाते हैं.
हम नादां उनका प्रयोग कर,
घर में दीप जलाते हैं.
कोई न जाने कब चुप हों
नाहक बजते इकतारे हैं.....

 

jai ho bahut khubsurat

Comment by sanjiv verma 'salil' on December 22, 2010 at 6:51pm
आप सबकी गुण ग्राहकता को समर्पित हैं चंद पंक्तियाँ

बागी लता नवीन मिथक है,
देख चकित रह जाते हैं.
हों न प्रभाकर तो योगी-
तम में बरबस भरमाते हैं.
शकुनी पांसे थामे तो
दुर्योधन के पौ बारे हैं.....
*
Comment by Lata R.Ojha on December 21, 2010 at 2:01pm

बहुत सुंदर रचना है ..
अपनी ही कमियों को नज़रअंदाज़ कर के खुद को सही साबित करने की कोशिश का कितना सटीक वर्णन..वाह!


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on December 21, 2010 at 10:44am

खुद को
तीसमारखां पाते हैं......सब मन का भ्रम और खुद को भुलावे मे रखने का प्रयत्न

 

जान हथेली पर रखकर-
वाहन जमकर दौड़ाते हैं.........नासमझी का सबसे बढ़िया उदाहरण...

बहुत बढ़िया आचार्य जी,सुंदर रचना ...

 

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