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वह एक छोटा सा टुकड़ा
जिस में मैने आशाओं को कैद कर
तुम्हें समर्पित किया था,
क्या तुमने वह
कागज का दिल
स्वीकार किया है,
कान्हा …. ?
मेघमाला के द्वारा
जो संदेश तुम्हें भेज था -
क्या उस दिल की धड़कन
तुमने सुनी थी
प्रभु. … ?

हवा में लहराते
मेरे शब्दों की गूँज
क्या तुन तक
पहुँच पायी है,
नाथ  … ?
चंद्रमा को देखते हुए
मेरे दिल में अंकित तुम्हारा रूप
जो मुझे नज़र आता है,
उस चंद्रमा में -
क्या मेरी एक झलक
तुम्हे दिखाई देती है,
कभी …?

तुम्हारे इंतज़ार में
वह स्वर्ण चंपा के नीचे -
बिताई हुई उन रातों का
स्वप्निल नज़ारा
तुम्हारे स्वप्न में
अवलोकन नहीं करता,
गोपाल …. ?

तुम्हारी बंसी से निकली
वह प्यार की धुन -
जो मुझे तुम्हारी ओर
खींच लाती थी,
क्या वह पल अब भी
आप को याद है,
वेणुधर ……. ?

सखी सहेली के संग
स्नान करते समय,
हमारे अंगवस्त्र जो तुम
छुपा लिया करते थे,
अनजान, बेखबर, मासूम बन
वेणुनाद में रत रहते थे-
क्या ये तुम्हें सोभा देता था,
मुरलीधर ……?

फिर भी तुम्हारी चाह में मैने
जो रातें अनिद्रा गुज़ारी हैं,
क्या उन पलों ने कभी तुम्हारे मन को
विचलित किया है,
नंदलाल … ?

हाथों में रची मेहंदी में
तुम्हारा नाम को दोहराते
हुए काँपते ओंठ की चुभन,
कभी आपको
भाव विव्हल नहीं करती,
स्वामी …. ?

मेरे पायल की वह झंकार
क्या आज आपके ह्रदय को
विचलित नहीं करती
प्रभु  …. ?

मेंरे कानों की बालियाँ
जब आपकी वेणुनाद से
मोहित होकर प्रकंपित होती थी,
उस प्रकंपन से -
आप कुछ क्षण ही सही
हमारी तरफ मंत्र मुग्ध होकर
अवलोकन करते थे …
तब आपकी आँखों की
चमक से मेरा तन
संकुचित हो जाता था,
तब आप क्या कहते थे
भूल गए-
कृष्ण … ?

गोपियों संग जब
घड़े में पानी भरकर
हम वापस लौटते थे,
आप वेणु की धुन से
हमारे पैरों को बाँध देते थे
और हम मंत्र मुग्ध होकर
आप की ओर चले आते थे,
तब हाँ तब  …….
हमारे पल्लू को पकड़ कर
आप अपने ओर खींच लेते थे न
कान्हा …।

क्या वह सारी याद आप को नहीं सताती ….
क्या आप की ह्रदय को नहीं झंझोड़ती …
क्या कभी इस राधा की याद नहीं आती … ?
क्या हमारे विरह की घड़ियाँ
आपको नहीं तड़पाती …. ?

फिर.… चले आइए  प्रभु --
एक बार, एक बार फिर
आपकी सुन्दरता को
जी भर के देखलेने दीजिए …

बस्, वह पल को हम
आँखों में ऐसे कैद कर लेंगे की
कभी आप हम से अलग
हो ही नहीं सकते ….
चले आओ प्रभु,
एक बार
सिर्फ एक बार …….
बस्।

© Lata Tejeswar
8/7/2013

composed by, Lata tejeswar,


"मौलिक व अप्रकाशित"

Views: 569

Comment

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Comment by Lata tejeswar on August 28, 2013 at 8:30am

Dhanyabaad adaraniya ... rachana ko sarhane ke liye...

vyakaran/ Taiping me trutiyon ke liye maafi chahungi


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on August 24, 2013 at 2:22pm

मनमोहन को समर्पित सुकोमल निर्मल भाव..

मीरा सी दर्शन की प्यास.. राधा सी मंत्रमुग्धता 

अभिव्यक्ति के लिए तहे दिल से बधाई आ० लता जी.

( टंकण की और कई जगह व्याकरण की त्रुटियाँ रह गयी हैं, उन्हें अवश्य ही सुधार लें )

शुभेच्छाएँ 

Comment by बृजेश नीरज on August 24, 2013 at 12:05pm

कान्हा की याद में राधा के भावों को बहुत ही सुन्दरता से शब्द देने का प्रयास किया है। आपको हार्दिक बधाई!

व्याकरण/ टाइपिंग की त्रुटियों पर ध्यान दें। इससे पठन बाधित होता है।

सादर!

Comment by अरुन 'अनन्त' on August 24, 2013 at 11:27am

वाह अप्रितम श्री कृष्ण के प्रति राधा जी के ह्रदय में विद्यमान प्रेम भाव समर्पण का बहुत ही सहजता एवं सुन्दरता से वर्णन किया है आपने आदरणीया इस भाव प्रधान सुन्दर रचना हेतु हृदयतल से बधाई स्वीकारें.

Comment by Lata tejeswar on August 23, 2013 at 11:23am
Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on August 22, 2013 at 7:30pm

सुंदर व् भावनाओं से ओतप्रोत रचना हेतु हार्दिक बधाई आदरणीया लता जी


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on August 22, 2013 at 3:39pm

सुन्दर भावपूर्ण रचना के लिये बधाई !!

Comment by वेदिका on August 22, 2013 at 2:30pm

भक्ति के भाव में तिरोहित रचना !!

बधाई आदरणीया लता जी!

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