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"क्या ये खबर सही है कि एकाध दिन में दंगे शुरू होने वाले हैं ?"
"बिलकुल सही सुना भाई, खबर एकदम पक्की है." 
"तो फिर क्या प्रोग्राम बनाया ?"
"सोच रहा हूँ कि इस दफा उनकी पार्टी में शामिल हो जाऊं."

"अबे तेरा दिमाग तो ख़राब नहीं हो गया ? बेगानों का साथ देकर अपनों से गद्दारी करेगा? 
"वो साले बेगाने ज़रूर हैं, लेकिन दिहाड़ी भी तो डबल देते हैं."

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Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on September 17, 2017 at 11:26pm

वाह !  एक और गज़ब गज़ब और गज़ब | 


प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on August 31, 2013 at 4:24pm

आपको लघुकथा पसंद आई, मेरा श्रम सार्थक हुआ प्रिय वसुंधरा जी. 


प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on August 31, 2013 at 4:21pm

हार्दिक आभार भाई अमन कुमार जी.


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on August 31, 2013 at 4:16pm

आदरणीय योगराजभाईसाहब, ये चुपके से कब सिक्सर मार दिया आपने ??? .. वाऽऽऽउ ! .. और सिक्सर भी कभी छुपने वाली एफ़ोर्ट होती है !!

इसे कहते हैं लघुकथा और लघुकथा का अंदाज़ !
कहन ऐसी कि एक भी शब्द इधर-उधर हुआ नहीं कि लघुकथा का संतुलन ही बिगड़ा. न एक शब्द ज्यादा, न एक शब्द कम. संप्रेषणीयता ऐसी कि कोई आँख बन्द कर ले और किसी से पढ़वा ले.. समझ में आ जायेगा कि लघुकथा कहना क्या चाहती है. कथा का सत्त मग़ज़ के मक्खन में गरम छुरी की तरह पार होता आता है.


उम्दा बानग़ी.. हक़ीक़तबयानी यों होती है.

बधाई-बधाई..  
सादर


प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on August 31, 2013 at 4:09pm

आद० डॉ प्राची सिंह जी, क्योंकि लघुकथा में बात बहुत कम शब्दों में कहने होती है अत: अन्य गुणों के साथ साथ इसके शिल्प में कसावट होना बेहद ज़रूरी होता है. कॉलेज के दिनों में हमारे एक प्रोफ़ेसर कहा करते थे कि लघुकथा की बुनावट भी किसी ग़ज़ल से कम नहीं, क्योंकि एक भी शब्द फालतू ले लेने से लघुकथा बे-वज़न हो जाती है. आपने मेरी कोशिश को सराहा और लघुकथा को पसंद किया, मैं दिल से आपका शुक्रिया अदा करता हूँ.      


प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on August 31, 2013 at 4:02pm

आपने रचना के मर्म को बखूबी समझा है भाई जीतेंद्र जीत जी, दिल से शुक्रिया.


प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on August 31, 2013 at 4:01pm

रचना पसंद करने के लिए ह्रदय तल से आभारी हूँ प्रिय महिमा श्री जी.


प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on August 31, 2013 at 4:01pm

दिल से आभार आद० विजय मिश्र जी.


प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on August 31, 2013 at 4:00pm

भाई शिज्जू शकूर जी, आप रचना पर आये उर अपनी बहुमूल्य राये दी - हार्दिक आभार.


प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on August 31, 2013 at 3:59pm

सादर धन्यवाद वंदना जी.

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