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पांच दोहे

 

खुद के अन्दर झाँक के, पढ़  ले तू आलेख

अपने ऐसे हाल का,  खुद  खींचा  आरेख

 

बाहर पानी से बुझे, कण्ठ लगी जो प्यास

भीतर जी मे जो लगी,कौन बुझाये प्यास

 

पंछी घर को लौटते, साँझ लगी गहराय

रे मन चल लग ठौर से,तू काहे पछुवाय

 

अन्धियारी में जुँ रहे, दीपक ही की खोज

अपने अन्दर खोजना, अपना सुख तू रोज   

 

बंद आँख कर देखिये,त्रितिय आँख की ओर

ध्यान सरलता से करें,तनिक न दीजे जोर

मौलिक एवँ अप्रकाशित

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Comment

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Comment by mrs manjari pandey on September 3, 2013 at 9:13pm

             आदरणीय भण्डारी जी बहुत सुन्देर भाव भरे दोहे. बहुत बहुत बधाइयां

Comment by AVINASH S BAGDE on September 3, 2013 at 8:40pm

खुद के अन्दर झाँक के, पढ़  ले तू आलेख

अपने ऐसे हाल का,  खुद  खींचा  आरेख...wah!गिरिराज भंडारी ji

Comment by बृजेश नीरज on September 3, 2013 at 6:46pm

बहुत ही सुन्दर दोहे हैं। आपको हार्दिक बधाई!

एक निवेदन कि ‘जुँ’  का अर्थ स्पष्ट कर दें।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on September 3, 2013 at 6:16pm

आदरणीया आन्नपूर्णा जी , उत्साह वर्धन के लिये बहुत शुक्रिया !! स्नेह बनाये रखें !

Comment by annapurna bajpai on September 3, 2013 at 4:41pm

आदरणीय भण्डारी जी बढ़िया , प्रभाव छोड़ते दोहों के लिए आपको हार्दिक बधाई । 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on September 3, 2013 at 7:59am

आदरणीय अभिनव अरुन जी , आपका बहुत आभार !! सच मे उत्साह वर्धन हुआ !! पहली बार दोहे रच्ने का प्रयास किया !! आभार !!

Comment by Abhinav Arun on September 3, 2013 at 7:44am

अपने भीतर की तलाश का आध्यात्मिक पुट लिए दोहे बहुत सार - संकेत लिए हुए हैं आदरणीय श्री गिगिराज जी , मंत्रमुग्ध हुआ इन्हे पढ़कर - गुनकर !!साधुवाद !!!


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on September 3, 2013 at 7:35am

आदरणीया वन्दना जी , उत्साह वर्धन के लिये हार्दिक आभार !!!


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on September 3, 2013 at 7:34am

जितेन्द्र भाई , उत्साह वर्धन के लिये आपका आभार !!

Comment by vandana on September 3, 2013 at 6:44am

सुन्दर संदेशपरक दोहे आदरणीय सर 

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