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उन्हें चस्का बहुत था बेरुखी हमसे भी करने का 

डुबो कर आँख मेरी पीर में काजल लगाने का   
तुम्हारे इश्क की सांसें अभी कागज में तैरेंगी 
कभी उड़कर जो पहुंचे तुम तलक जादू है लफ्जों का 
-------------------------------------------------------
हवा भी रुख बदल लेती दिया जब प्यार जलता है 
अँधेरा भी करे साजिश मगर सूरज निकलता है  
कोई कर्जा पुराना है नयन बादल का सागर पर 
कभी बदले नहीं वो पर जमाना ही बदलता है  
-------------------------------------------------------  
पसीने की बयारों से कँवल बनकर के खिलता है 
कठिन हर प्रश्न का उत्तर सरल बनकर के मिलता हैं  
मगर उम्मीद क्यूँ करता है अंधे से भी काजल की 
मोहब्बत से मिला हमको वही अक्सर बदलता है 
 ---------------------------------------------------------
मौलिक एवं अप्रकाशित 
आशीष श्रीवास्तव ( सागर सुमन ) 

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Comment by ram shiromani pathak on September 3, 2013 at 3:13pm

सुन्दर मुक्तक रचे है आपने बधाई स्वीकार करें आदरणीय आशीष भाई//


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on September 3, 2013 at 2:07pm

आदरणीय आशीष भाई , सुन्दर मुक्तक !! बहुत बधाई !!

Comment by Ashish Srivastava on September 3, 2013 at 10:32am

Shyam Narain Verma जी 

जी , सराहना एवं बधाई के लिए आभारी हूँ 

Comment by Ashish Srivastava on September 3, 2013 at 10:32am

अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव  जी , सराहना एवं बधाई के लिए आभारी हूँ 

Comment by अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव on September 3, 2013 at 10:14am

 आशीष भाई- सप्रेम राधे- राधे । "अँधेरा भी करे साजिश मगर सूरज निकलता है " जैसी पंक्तियों के लिए बधाई।

Comment by Shyam Narain Verma on September 3, 2013 at 10:04am
बहुत सुन्दर...बधाई स्वीकार करें ………………

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