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ग़ज़ल .... मयकशी मयकशी नहीं लगती !

ग़ज़ल
....

मयकशी मयकशी नहीं लगती !
रौशनी रौशनी नहीं लगती !!
.....
अब इबादत में दिल नहीं लगता !
बन्दगी बन्दगी नहीं लगती !!
......
हर तरफ भीड़ और मैं तनहा!
बेबसी बेबसी नहीं लगती !!
...
दिल में रखते हैं वोह तो दिल कितने !
आशिकी आशिकी नहीं लगती !!
...
गुफ़्तगू आप से करें कैसे !
आपको तो  कमी नहीं लगती
....
हैं खफा वोह अगर खफा हम है !
दोसती दोसती नहीं लगती !!
....
चाँद तारों के साथ चलता हूँ !
तो सफर में कमी नहीं लगती !!
...
साँस लेता हूँ अब हवा के लिए ,
ख़ुदकुशी ख़ुदकुशी नहीं लगती !!
....


राज लाली शर्मा (बटाला)

मौलिक एवं अप्रकाशित

Views: 1124

Comment

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Comment by राज लाली बटाला on February 7, 2014 at 10:04pm

 Neeraj Kumar 'Neer' ji ..bahut bahut shukria jji 

Comment by Neeraj Neer on September 28, 2013 at 8:45am

बहुत खूब ग़ज़ल कही है 

Comment by राज लाली बटाला on September 27, 2013 at 9:31pm

सलीम रज़ा भाई !! शुक्रिया बहुत बहुत आपका !!

Comment by राज लाली बटाला on September 27, 2013 at 9:30pm

ram shiromani pathak जी , बहुत बहुत शुक्रिया !!

Comment by राज लाली बटाला on September 27, 2013 at 9:30pm

Baidya Nath 'सारथी' जी , ख़ुशी हुई जी !! शुक्रिया ..आभारी हूँ !

Comment by SALIM RAZA REWA on September 27, 2013 at 9:29pm

 खुबसूरत गजल,

Comment by ram shiromani pathak on September 27, 2013 at 4:47pm

बहुत ही  सुंदर  गजल, बधाई आदरणीय राज जी

Comment by Saarthi Baidyanath on September 27, 2013 at 12:07pm

अब इबादत में दिल नहीं लगता !
बन्दगी बन्दगी नहीं लगती .......माशा-अल्लाह !...जियो साहब ..:)

Comment by राज लाली बटाला on September 26, 2013 at 11:57pm

जितेन्द्र 'गीत' जी , आभारी हूँ आपका !! ख़ुशी हुई !!

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on September 26, 2013 at 11:54pm

बहुत ही खुबसूरत गजल, बधाई स्वीकारे आदरणीय राज लाली जी

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