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ये क्या हो रहा है
ये क्यों हो रहा है
नकली चीज़ें बिक रही हैं
नकली लोग पूजे जा रहे हैं...
नकली सवाल खड़े हो रहे हैं
नकली जवाब तलाशे जा रहे हैं
नकली समस्याएं जगह पा रही हैं
नकली आन्दोलन हो रहे हैं
अरे कोई तो आओ...
आओ आगे बढ़कर 
मेरे यार को समझाओ
उसे आवाज़ देकर बुलाओ...
वो मायूस है
इस क्रूर समय में
वो गमज़दा है निर्मम संसार में...
कोई नही आता भाई..
तो मेरी आवाज़ ही सुन लो 
लौट आओ
यहाँ दुःख बाटने की परंपरा है..
यहाँ सांझा चूल्हे की सेंक है....
तुम एक बार अपने फैसले पर दुबारा विचार करो...
मेरे लिए...
हम सबके लिए.....

(मौलिक अप्रकाशित) 

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on October 1, 2013 at 5:02pm

आज के तथाकथित विकास और बदलाव से मिथ्याचरण और ढकोसला को जिसी इज़्ज़त मिली है कि सार्थक लेकिन भावुक परंपरायें हाशिये पर जाती स्पष्ट दिख रही हैं. कवि-हृदय की सच्चाई इसे देख भी पाती है और छटपटाती भी है. आँगन तक एकसार नहीं रह गये हैं. किसी उम्मीद की तरह प्रस्तुत हुई यह कविता यह घोषणा करने में सक्म अवश्य हुई है कि काग़ज़ी माहौल के तारी होने के बावज़ूद सबकुछ काग़ज़ी नहीं हुआ है. 

हृदय से बधाइयाँ आदरणीय

Comment by ram shiromani pathak on September 27, 2013 at 4:46pm

सुंदर रचना //बहुत बहुत बधाई 

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on September 26, 2013 at 11:52pm

सुंदर सशक्त रचना, बधाई स्वीकारें आदरणीय अनवर साहब

Comment by रविकर on September 26, 2013 at 5:26pm

नकली जब नकलेल हो, नक्शा बदले बैल |
नकली हो प्रश्नोत्तरी, नकली नेता रैल |
नकली नेता रैल, बात पूरी कह डाली |
उनके मन का मैल, बनाये उन्हें बवाली |
साधुवाद श्रीमान, विषय लाते हो असली |
भाव कथ्य उत्कृष्ट, जगत मिथ्या अब नकली |||

Comment by annapurna bajpai on September 26, 2013 at 1:11pm

सुंदर रचना , बधाई आपको । 

Comment by Abhinav Arun on September 26, 2013 at 3:51am

सुन्दर सशक्त अनवर साहिब !!

Comment by Sarita Bhatia on September 25, 2013 at 11:19pm

बहुत खूब आदरणीय 

कृपया ध्यान दे...

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