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बा-शिन्दे अभिमत यही, भेजें यह अभिलेख -

आलू-बंडे से अलग, मुर्गी अंडे देख |
बा-शिन्दे अभिमत यही, भेजें यह अभिलेख |


भेजें यह अभिलेख, नहीं भेजे में आये |
गिरा आम पर गाज, बड़ा अमलेट बनाए |,


भेदभाव कुविचार, किचन कैबिनट में चालू |
अंडे हुवे विशेष, हमेशा काटे आलू ||

मौलिक/ अप्रकाशित

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Comment by Sanjay Mishra 'Habib' on October 2, 2013 at 9:50am

बिंबों का बहुत सुंदर प्रयोग होता है आपकी कुंडलियों में आदरणीय रविकर जी...

बड़ी चतुराई से लक्ष्यवेधन करती कुण्डलिया हेतु सादर बधाई स्वीकारें....


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on October 2, 2013 at 7:51am

आदरणीय रविकर सर जब भी कुण्डलिया छंद की चर्चा होती है आपका चेहरा सामने आ जाता है,और अपनी रचना के लिये आपको मजमून ढूँढना नही पड़ता बल्कि यह खुद आपके पास दौड़ा चला आता है, आपकी इसी बात का मैं कायल हूँ, दिली दाद कुबूल करें

Comment by अरुन 'अनन्त' on October 1, 2013 at 9:29pm

आदरणीय रविकर बेजोड़ कुण्डलिया छंद बहुत ही बढ़िया बहुत बहुत बधाई स्वीकारें.


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on October 1, 2013 at 9:10pm

आदरणीय रविकर जी , सुन्दर कुंडलिया , बहुत अच्छा व्यंग !! आपको बधाई !!

Comment by ram shiromani pathak on October 1, 2013 at 8:44pm

बहुत ही सटीक व्यंग आदरणीय  रविकर  जी //हार्दिक बधाई आपको 

Comment by विजय मिश्र on October 1, 2013 at 5:18pm
कटु सत्य , तन्त्र अधिनायाकता की ओर तीव्रता से अग्रसर है ,चूँकि पहले भी देखा है ,इसलिए इन कुचालियों के आचरण से चौंकता नहीं .चिंता का विषय है और आपने सुंदर शब्दों में व्यक्त किया .धन्यवाद रविकरजी

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