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ग़ज़ल - दोपहरी में छाँव लिखूं

ग़ज़ल –


2222  2112

दोपहरी में छाँव लिखूं ,
जब भी अपना गाँव लिखूं |

जन्नत की जब बात चले ,
अपनी माँ के पांव लिखूं |

पांचाली की पीर बढ़ी ,
दुर्योधन के दांव लिखूं |

दिल दिल्ली से टूटा है,
खुल के अब डुमरांव लिखूं |

सड़कों पर विश्राम नहीं ,
पगडण्डी की ठांव लिखूं |

 

 

* सर्वथा मौलिक और अप्रकाशित ।

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Comment

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on October 15, 2013 at 11:31pm

सरल शब्दों से गहन बात करना इसे ही कहते हैं ..  दिल से बधाई लें, भाईजी.

वाह वाह !

मिसारों का वज़्न 2 2 2 2 2 2 2 लिखना था.  फेलुन फेलुन ... फा... के अनुसार वो भी सही होगा.

शुभ-शुभ

Comment by Abhinav Arun on October 8, 2013 at 9:50am

आ. श्री कपीश जी रचना पढने , पसंद , करने और विचार प्रकट करने के लिए हार्दिक धन्यवाद आपका !!

Comment by Abhinav Arun on October 8, 2013 at 9:49am

आदरणीय श्री अखिलेश जी क्या कहने दिल खुश हुआ आदरणीय , इस दाद के लिए सौ सौ आभार ह्रदय से :-) !!

Comment by Abhinav Arun on October 8, 2013 at 9:48am

आ.डॉ प्राची मैडम , ग़ज़ल पसंद आई शुक्रगुज़ार हूँ आपका , धन्यवाद बहुत बहुत !!

Comment by Kapish Chandra Shrivastava on October 7, 2013 at 8:39pm

    बहुत ही सुन्दर छंद लिखी है आपने । " जन्नत की जब बात चले , अपनी माँ के पाँव लिखूं । " इस पंक्ति पर विशेष बधाई स्वीकारें आदरणीय अभिनव अरुण जी । 
Comment by अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव on October 7, 2013 at 8:17pm

कम शब्दों में ज्यादा कहना कोई आप से सीखे । हार्दिक बधाई आत्मीय  अभिनव अरुण जी 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on October 7, 2013 at 8:03pm

आ० अभिनव अरुण जी 

बहुत सुन्दर अशआर कहे है..

जन्नत की जब बात चले ,
अपनी माँ के पांव लिखूं |.....वाह !

हार्दिक बधाई 

Comment by Abhinav Arun on October 7, 2013 at 3:48pm

बहुत आभार आदरणीय कुंती जी , आशीर्वाद के लिए शुक्रिया नमन वंदन !!

Comment by coontee mukerji on October 7, 2013 at 3:26pm

एक एक लाइन चीख रही है ...अरून जी...द्रौपदी की तरह.

Comment by Abhinav Arun on October 7, 2013 at 6:50am

परम आदरणीय श्री arun kumar nigam  जी यह आपका अनुराग है ..आपका आशीर्वाद पा धन्य हुआ , सौभाग्य मेरा , आभार !!

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