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रांची का रेलवे स्टेशन.

फुलमनी ने देखा है

पहली बार कुछ इतना बड़ा .

मिटटी के घरों और

मिटटी के गिरिजे वाले गाँव में

इतना बड़ा है केवल जंगल.

जंगल जिसकी गोद में पली है फुलमनी

कुलांचे मारते मुक्त, निर्भीक. 

पेड़ों के जंगल से

फुलमनी आ गयी

आदमियों के जंगल में ,

जंगल जो लील जाता है 

जहाँ सभ्य समाज का आदमी

घूरता हैं

हिंस्र नज़रों से

सस्ते पोलिस्टर के वस्त्रों को

बेध देने की नियत से ....

फुलमनी बेच दी गयी है

दलाल के हाथों,

जिसने दिया है झांसा

काम का ,

साथ ही देखा है

उसके गुदाज बदन को

फुलमनी दिल्ली में मालिक के यहाँ

करेगी काम,

मालिक तुष्ट करेगा अपने काम

काम से भरेगा

उसका पेट

वह वापस आएगी जंगलों में

जन्म देगी

बिना बाप के नाम वाले बच्चे को.

(फिर कोई दूसरी फूलमनी देखेगी 

पहली बार रांची का रेलवे स्टेशन..) 

... नीरज कुमार ‘नीर’

पूर्णतः मौलिक एवं अप्रकाशित 

 

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Comment

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Comment by Neeraj Neer on November 2, 2013 at 11:58am

आदरणीय सौरभ जी आपका हार्दिक आभार , आपकी टिप्पणी ने रचना को सार्थक कर दिया .. आपने बहुत ही सुन्दर विवेचना किया ,  जिस तरह से आपने  पिठौरिया, सरायकेला, रातू अथवा टाटीसिलवे का सन्दर्भ लिया उससे यह स्पष्ट है कि आप भली भांति इलाके के भूगोल से परिचित है और स्थानीय सामजिक समस्यायों की भी गहरी समझ आपकी है.

आपकी एक बात बड़ी अच्छी लगी .. कि कसाई की तरह घूरते हुए क्रॉस पहन लेता है ...  क्या आश्चर्य की बात है कि यूरोप या अमेरिका से आया गोरा मिशनरी उन्हें अपना लगता है , रक्षक लगता है जबकि यहाँ का समाज उसे दुश्मन लगता है .. आज निहित स्वार्थ जिसका प्रतिफल अत्यंत क्षणिक रहने वाला है से प्रेरित होकर अपने समाज , देश के लोग काम कर रहे है, परिणाम अत्यंत भयावह होने वाला है .. कुछ भी साबूत नहीं बचेगा ,, ना झूठ फरेब कर कमाई गयी दौलत और ना ही इज्जत , लेकिन कोई समझने को तैयार नहीं.... आपकी टिपण्णी के लिए सादर आभार .. 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on November 2, 2013 at 5:02am

दिक्कू दलालों की बेहयी नज़रों के सापेक्ष रेजाओं की दशा को जिस शिद्दत से यह कविता उभारती हुई आगे बढ़ती है, उस प्रवाह में काव्य-शिल्प का गौण होना कोई अर्थ नहीं रखता.
 
कविता का कथ्य जो कुछ साझा करता है वह कई एक घटना का अतिशयोक्ति रूप मात्र नहीं, बल्कि पिठौरिया, सरायकेला, रातू अथवा टाटीसिलवे जैसे चितकबरे ढंग से विकसित तथा उनके आगे गहन भीतर जंगल की कितनी ही फुलमनियों के ताम्बई छौनों के प्रश्न साझा करता है. वे छौने जो अपनी पीली-भफसायी आँखों से हर दिक्कू को कसाई की तरह घूरते हुए तनमनाये क्रॉस पहन लेते हैं. और/या फिर, बन्दूक उठा लेते हैं.
इन भूमिपुत्र-पुत्रियों की नैसर्गिक निश्छलता को तो कब का पीया जा चुका है. अब जब तलछट की बची सिट्ठियों की कड़वाहट भारी पड़ रही है तो हमारे सभ्य समाज में सबका रोआँ-रोआँ अदबदा रहा है.

नीरज भाई, दिल से बारम्बार बधाई ! आपकी कविता अति संवेदनशील मुद्दे पर सार्थक रूप से मुखर है. दिल से शुभकामनाएँ निकल रही हैं.
सादर

Comment by Neeraj Neer on October 29, 2013 at 9:36am

आदरणीय राजेश मृदु जी आपका धन्यवाद .. 

Comment by Neeraj Neer on October 29, 2013 at 9:36am

आ. प्रदीप कुमार शुक्ला जी आपका हार्दिक आभार . मैं आपकी बातों का ख्याल रखने की कोशिश करूँगा ..

Comment by Neeraj Neer on October 29, 2013 at 9:34am

आदरणीय लडिवाला जी आपका हार्दिक आभार 

Comment by Neeraj Neer on October 29, 2013 at 9:33am

विशाल चर्चित जी आपका आभार 

Comment by Neeraj Neer on October 29, 2013 at 9:33am

आदरणीय सुशिल जोशी जी आपका हार्दिक आभार ..

Comment by Neeraj Neer on October 29, 2013 at 9:32am

आपका आभार आदरणीय गिरिराज भंडारी जी 

Comment by राजेश 'मृदु' on October 28, 2013 at 2:56pm

फुलमनी के माध्‍यम से उठाया गया प्रश्‍न सामयिक है, इस हकीकत से दो-चार होते हुए भी करने को कुछ दिखता नहीं तथापि कवि कर्म यही कहता है कि समस्‍याएं सामने लाई जाएं और आपने वही किया, आपको साधुवाद इस कृत्‍य के लिए, सादर

Comment by Pradeep Kumar Shukla on October 28, 2013 at 12:46pm

behad prabhaavi rachna Neeraj ji ... atukaant aur chhandmukt shilpshaili main bilkul bhi nahin samajh paata ... shabdon ki thodi aur kanjoosi yadi sambhav ho to avashya karein, aisa mujhe padhte samay laga ... aapko badhai is rachna ke liye

 

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