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प्राण जिसमें है मरेगा ( गज़ल ) गिरिराज भंडारी

2122  2122 ( बिना रदीफ )

जो भरा है वो बहेगा   

रिक्तता है तो भरेगा

 

डर हमे काहे सताये

प्राण जिसमें है मरेगा

 

कानों सुनके आँखों देखे

चुप भला कैसे रहेगा

 

लेखनी पे हो नज़र तो

वो नज़र से ही कहेगा

 

गर्त पूछे आदमी से

और कितना तू गिरेगा

 

जो ज़हर सा बोलता है

बस वही पीड़ा हरेगा

 

खूब मीठा बोल मत तू

देखना कीड़ा पड़ेगा

ज़ोर मिल कर सब लगायें

देखिये  पर्वत हिलेगा

नेक - बद दोनों खड़े  है

सोचते हैं  क्या मिलेगा ?

  *****************

मौलिक एवँ अप्रकाशित ( संशोधित )

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on November 26, 2013 at 9:38am

जो भरा है वो बहेगा   

रिक्तता है तो भरेगा

 

डर हमे काहे सताये

प्राण जिसमें है मरेगा

ज़ोर मिल कर जब लगाये

तब लगा पर्वत हिलेगा

 तीनो शेर लाजबाब हैं 

खूब मीठा बोल मत तू

देखना कीड़ा पड़ेगा.....व्यंग को पढ़कर एक बार को हँसी आ गई सच में बहुत मीठा व्यंग्य है ,पूरी गैरमुरद्दफ़ ग़ज़ल शानदार हुई है तहे दिल से बधाई आदरणीय गिरिराज जी 

 

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on November 26, 2013 at 8:17am

गर्त पूछे आदमी से

और कितना तू गिरेगा.......वाह! बहुत खूब

 

जो ज़हर सा बोलता है

बस वही पीड़ा हरेगा.........कटु सत्य

 

खूब मीठा बोल मत तू

देखना कीड़ा पड़ेगा...........यह तो खास बात कही

एक-एक शेर आज की कटु सच्चाई को चित्रित  करता हुआ, दिली दाद कुबूल कीजिये आदरणीय गिरिराज जी

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on November 25, 2013 at 10:32pm

मित्र

इतनी छोटी  बह्र पर ग़ज़ल वह भी इतनी अच्छी

सचमुच मजा आया 

 जो जहर सा बोलता  है , बस वही पीड़ा हरेगा

क्या  बात है  i  बहुत बहुत  बधाई i


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on November 25, 2013 at 9:55pm

आदरणीय राम अवध भाई , ग़ैरमुरद्दफ़ गज़ल के पहले प्रयास मे हौसला अफज़ाई के लिये आपका तहे दिल से शुक्र गुज़ार हूँ !!!!!


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on November 25, 2013 at 9:52pm

आदरणीय शिज्जू भाई , गज़ल की सराहना के लिये आपका तहे दिल से आभार !!!!!! और , ग़ैरमुरद्दफ़   नाम लिख कर याद दिलाने के लिये भी , मै नाम भूल ही गया था , इसी लिये बिना रदीफ लिख दिया था !!!! आपका पुनः आभार !!!

Comment by Ram Awadh VIshwakarma on November 25, 2013 at 9:04pm

फाइलातुन फाइलातुन

इतनी छोटी बहर में गजल का निर्वाह वाकर्इ काबिले तारीफ है भण्डारी सर बधार्इ हो उत्तम गजल कहने के लिय।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on November 25, 2013 at 8:56pm

आदरणीय गिरिराज सर अच्छी ग़ैरमुरद्दफ़ ग़ज़ल है दाद कुबूल करें

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