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चलो मिलते हैं वहाँ ........ मीना पाठक

धरती के उस छोर पर 
धानी चूनर ओढ़ कर    
वसुधा मिलती हैं अनन्त से जहाँ
चलो मिलते हैं वहाँ !!
 
बन्धन सारे तोड़ कर
लहरों की चादर ओढ़ कर
दरिया मिलता है किनारे से जहाँ
चलो मिलते हैं वहाँ!! 

पर्वतों से निकल कर
लम्बी दूरी चल कर
नदियाँ मिलती है सागर से जहाँ
चलो मिलते हैं वहाँ!! 

बसंती भोर में
खिले उपवन में
भँवरे फूलों से मिलते हैं जहाँ
चलो मिलते हैं वहाँ !!

स्वाति नक्षत्र के
वर्षा की इक बूँद से
तृप्त हो चातक मिलता है जहाँ
चलो मिलते हैं वहाँ!! 

पूनम की रात में
चाँदनी विस्तार से
किलोल करती मिलती हैं जहाँ
चलो मिलतें हैं वहाँ !!
 

जमुना के तट पर
बाँध उमंगो की डोर
मिलती है राधा कृष्ण से जहाँ
चलो मिलते हैं वहाँ !!

सांसों की लय तोड़ कर
नश्वर काया छोड़ कर
आत्मा परमात्मा से मिलती है जहाँ
चलो मिलते हैं वहाँ !!

मीना पाठक 

मौलिक/अप्रकाशित 

Views: 895

Comment

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Comment by Meena Pathak on November 30, 2013 at 1:38pm

आदरणीय पंकज त्रिवेदी जी बहुत बहुत हार्दिक आभार स्वीकारें | रचना पर आपकी उपस्थिती मेरे लिए आप का आशीर्वाद है | सादर 

Comment by Meena Pathak on November 30, 2013 at 1:35pm

हार्दिक आभार आदरणीय बृजेश जी | बहुत बहुत आभार स्वीकारें | सादर 

Comment by Meena Pathak on November 30, 2013 at 1:34pm

आदरणीया प्राची जी मैं कई दिनों से इस रचना को ले कर दुविधा मे थी कि मैंने ये क्या लिखा है किसी को पसन्द आएगी भी कि नही OBO पर डालने से डर रही थी पर डरते डरते मैंने इसे पोस्ट कर दिया उसके बाद धड़कते दिल और फिंगर क्रोस कर  बार बार मोबाइल की खिड़की से झाँक झाँक कर देख रही थी,आ० कुन्ती दी, आ० गोपाल जी फिर आप की टिप्पणी ने तो मुझे गद्गद कर दिया | सच मे मेरा लिखना सार्थक हुआ | आप सब की हौसलाफजाई ही मुझे लिखने को प्रेरित करती है | आप की टिप्पणी मेरे लिए अनमोल है | बहुत बहुत आभार आ० प्राची जी | सादर    

Comment by Meena Pathak on November 30, 2013 at 12:53pm

आदरणीय गोपाल नारायण जी सही कहा आप ने बड़े ही मनोरम स्थल हैं | रचना सराहने हेतु आभार स्वीकारें | सादर 

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on November 30, 2013 at 8:22am

बहुत  ही सुंदर  मनमोहक रचना ,बधाई स्वीकारें आदरणीया मीना दीदी

Comment by annapurna bajpai on November 29, 2013 at 10:51pm

आदरणीया मीना जी बहुत सुंदर भावभिव्यक्ति , सुंदर शिल्प के साथ सुदर रचना बहुत बधाई आपको । ऐसे ही रचनाएँ रचती रहे । 

Comment by Pankaj Trivedi on November 29, 2013 at 9:51pm

मीना जी, आपकी रचनाएँ हमेशा पढ़ता हूँ.. मगर बहुत गहराई की अनुभूति उभर आई है.. कविता को सम्पूर्णता की ओर अग्रेसर करने में आपकी सफलता ने मन मोह लिया.. बधाई 

Comment by बृजेश नीरज on November 29, 2013 at 9:30pm

बहुत ही सुन्दर रचना है! आदरणीया प्राची जी इस रचना के विषय में पहले ही इतना कह चुकी हैं कि अब कहने को कुछ शेष नहीं है.

आपको हार्दिक बधाई!


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on November 29, 2013 at 8:12pm

आदरणीया मीना जी 

आपकी इस प्रस्तुति नें बस मोह लिया.... आपकी अब तक की सबसे सुन्दर रचना है ये... और इतनी खूबसूरत की तारीफ़ के लिए शब्द कम हैं 

कथ्य, शिल्प, शब्द चयन, भाव, माधुर्य, रस हर लिहाज से एक अति उन्नत प्रस्तुति के लिए बहुत बहुत बधाई स्वीकार करें 

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on November 29, 2013 at 7:20pm

मीना जी

बड़े मनोरम स्थल आपने चुने  

इस भावपूर्ण कविता  के लिए आपको भूरि भूरि बधाई  i

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