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ग़ज़ल - (रवि प्रकाश)

बहर-ऽ।ऽऽ ऽ।ऽऽ ऽ।ऽ
.
ज़िंदगी कैसी बग़ावत हो गई।
मौसमों से भी अदावत हो गई॥
.
ले चली है हाँकती जाने किधर,
वासना सबकी महावत हो गई।
.
संयमी का पेट आधा ही भरा,
भोगियों की रोज़ दावत हो गई।
.
चापलूसी है चलन में इन दिनों,
वीरता केवल कहावत हो गई।
.
रुक गई थी काँप के दो पल 'रवी',
साँस मेरी फिर यथावत हो गई॥
.
-मौलिक व अप्रकाशित॥

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Comment

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Comment by Ravi Prakash on December 3, 2013 at 1:54pm
आपका आशीर्वाद मिलना सचमुच गर्व की बात है। प्रयासों को बल और लेखनी को संबल मिला है।सराहना तथा उत्साहवर्धन के लिए हार्दिक धन्यवाद। आशीर्वाद बनाए रखें आदरणीय॥
Comment by वीनस केसरी on December 3, 2013 at 2:54am

गज़ब गज़ब ..

जिंदाबाद
बेहद कामयाब ग़ज़ल हुई है ... ठेरो दाद

Comment by Ravi Prakash on December 2, 2013 at 11:43am
आपसे नहीं छूटा आदरणीय, मेरा ही रचना क्रम बाधित हो गया था। बहरहाल हार्दिक धन्यवाद॥
Comment by विजय मिश्र on December 2, 2013 at 10:31am
रविजी ! बहुत दिन बाद दर्शन हुए , मुझसे छुटा या आप हीनहीं आये ,पता नहीं | सुंदर रचना , बधाई |
Comment by Ravi Prakash on November 30, 2013 at 2:11pm
सराहना तथा उत्साहवर्धन के लिए हार्दिक धन्यवाद आदरणीय जितेन्द्र जी एवं राजेश जी। आशीर्वाद बनाए रखें॥
Comment by राजेश 'मृदु' on November 30, 2013 at 2:03pm

सुंदर प्रस्‍तुति हेतु हार्दिक बधाई, सादर

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on November 30, 2013 at 9:28am

संयमी का पेट आधा ही भरा,
भोगियों की रोज़ दावत हो गई।........वाह! क्या बात कही है,

चापलूसी है चलन में इन दिनों,
वीरता केवल कहावत हो गई।............यह तो शत-प्रतिशत सच है

आज के समय में पूर्ण रूप से फिट है, हार्दिक बधाई स्वीकारें आदरणीय रवि जी

Comment by Ravi Prakash on November 30, 2013 at 7:03am
इतने सूक्ष्म विवेचन, विश्लेषण तथा मार्गदर्शन के लिए हार्दिक धन्यवाद आदरणीय अजय जी। आशीर्वाद बनाए रखें॥
Comment by ajay sharma on November 29, 2013 at 11:28pm

ले चली है हाँकती जाने किधर,
वासना सबकी महावत हो गई।   bahut khoob 
.
संयमी का पेट आधा ही भरा,
भोगियों की रोज़ दावत हो गई।   100% kalyugi sach 
.
चापलूसी है चलन में इन दिनों,
वीरता केवल कहावत हो गई।      200% tathyaprna  
.
रुक गई थी काँप के दो पल 'रवी',
साँस मेरी फिर यथावत हो गई॥    bahut khoob kintu ,kuch aur .......

daud me ruk hi gayi  thi , waqt ke ,

saans meri fir yathawat ho gayi

  
.

Comment by Ravi Prakash on November 29, 2013 at 8:49pm
धन्यवाद आदरणीय। यूँ ही आशीर्वाद बनाए रखें॥

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