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ग़ज़ल - (रवि प्रकाश)

बहर-ऽ।ऽऽ ऽ।ऽऽ ऽ।ऽ
.
ज़िंदगी कैसी बग़ावत हो गई।
मौसमों से भी अदावत हो गई॥
.
ले चली है हाँकती जाने किधर,
वासना सबकी महावत हो गई।
.
संयमी का पेट आधा ही भरा,
भोगियों की रोज़ दावत हो गई।
.
चापलूसी है चलन में इन दिनों,
वीरता केवल कहावत हो गई।
.
रुक गई थी काँप के दो पल 'रवी',
साँस मेरी फिर यथावत हो गई॥
.
-मौलिक व अप्रकाशित॥

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Comment

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Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on November 29, 2013 at 7:33pm

रवि प्रकाश जी

अच्छा हुआ आपकी साँसे यथावत हो गयी

वर्ना हम कही  के न रहते

हमें इतनी अच्छी  गज़ले कौन  देता  i  बधाई हो प्रिय  i

Comment by Ravi Prakash on November 29, 2013 at 4:35pm
धन्यवाद।
Comment by Saarthi Baidyanath on November 29, 2013 at 3:27pm

ले चली है हाँकती जाने किधर,
वासना सबकी महावत हो गई।.....सार्थक शेर ...बहुत बढ़िया !

Comment by coontee mukerji on November 29, 2013 at 3:08pm

.
ले चली है हाँकती जाने किधर,
वासना सबकी महावत हो गई।............क्या अंदाज़ है. बहुत खूब...../

Comment by Nilesh Shevgaonkar on November 29, 2013 at 3:03pm

वाह वाह क्या ख़ूब ग़ज़ल कही है ...
ले चली है हाँकती जाने किधर,
वासना सबकी महावत हो गई।.... इस शेर के लिए विशेष दाद क़ुबूल करें आदरणीय 

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