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भाव की हर बांसुरी में

भर गया है कौन पारा ?

देखता हूं

दर-बदर जब

सांझ की

उस धूप को

कुछ मचलती

कामना हित

हेय घोषित

रूप को

सोचता हूं क्‍या नहीं था

वह इन्‍हीं का चांद-तारा ?

बौखती इन

पीढि़यों के

इस घुटे

संसार पर

मोद करता

नामवर वह

कौन अपनी

हार पर

शील शारद के अरों को

ऐंठती यह कौन धारा ?

इक जरा सी

आह सुन जो

छूटता

ले प्राण था

तू ही जिनकी

जिंदगी था

तू ही जिनकी

जान था

चाहते थे वे रथी कब

सारी धरती व्‍योम सारा ?

देवता वो

कौन है जो

हर सके

इस पाप को

गुणसूत्र की

वेणी पकड़ ये

लीलते बस

'आप' को

स्‍वार्थ की ताबीज ताने

किसने है ये मंत्र मारा ?

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

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Comment

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Comment by राजेश 'मृदु' on December 3, 2013 at 1:04pm

आदरणीया प्राचीजी, आपका आभार कि आपने पूरे मनोयोग से ना केवल रचना को पढ़ा बल्कि एक क्रमबद्ध तरीके से हुई भूलों को भी रेखांकित किया ।  जैसा कि पहले ही मैंने कहा कि कुछ चीजें मैं समझ नहीं पा रहा हूं, वह यही बात थी जिसे आपने अत्‍यंत सरल तरीके से समझाया है । इस क्रम में दो चीजें मुझे बहुत स्‍पष्‍ट हुई पहली केवल मात्र मात्रिकता का पालन ही नहीं करना है बल्कि मात्रा भार को भी संयत रखना है दूसरे गेयता के लिए शब्‍द संयोजन भी तदनुसार होना चाहिए । मैं आदरणीय सौरभ जी का भी आभारी हूं कि उन्‍होंनें इस ओर ना केवल इंगित किया बल्कि उनकी टिप्‍पणी के बाद  आपके सहयोग से अत्‍यंत महत्‍वपूर्ण बिंदुओं से मैं परिचित हुआ ।

किंतु अभी भी एक बात मुझे पूरी तरह समझ में नहीं आ रही, आपने कहा यद्यपि कारक विभक्तियों में ये सहज लग रहा है  इस बात को थोड़ा समझा सकें तो बड़ी कृपा होगी, उदाहरण दे सकें तो मैं जल्‍दी समझ जाउंगा, सादर


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on December 2, 2013 at 9:56pm

आदरणीया प्राचीजी,  आपने शिल्प पर सार्थक विन्दु साझा किये हैं.

किसी रचना का शब्द विन्यास या उसकी वर्णिकता या मात्रिकता एकसार हो तभी गेयता का शुद्ध निर्वहन होता है. सर्वोपरि, किसी गीत / नवगीत अथवा छंद की मात्रिकता या वर्णिकता या उसके शाब्दिक संयोजन की कसौटी उसकी गेयता ही है. यही उसके शिल्प विधान का मूल है. जैसे ही वर्णिकता / मात्रिकता या शब्द संयोजन का क्रम या आवृति बदली नहीं कि उस रचना की गेयता गयी. यह किसी गीत/ नवगीत या छंद रचना का सबसे बड़ा दोष है.

आपका सादर आभार कि आपने तथ्य को स्पष्ट किया. 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on December 2, 2013 at 8:28pm

इस नवगीत में आपने मुख्य पंक्तियों को २१२२ २१२२ २१२२ २१२२ की आवृति में लिया है और बंद को २१२२ २१२२ २१२२ २१२ की आवृति में लिया है 

तू ही जिनकी

जिंदगी था

तू ही जिनकी

जान था

चाहते थे वे रथी कब

सारी धरती व्‍योम सारा ?

गुणसूत्र की

वेणी पकड़ ये

लीलते बस

'आप' को

स्‍वार्थ की ताबीज ताने

किसने है ये मंत्र मारा ?

सिर्फ रेखांकित अंशों में ही मात्रिकता का निर्वहन नहीं हो रहा या यहाँ गेयता के लिए दीर्घ मात्रा को  गिरा कर पढना पढ़ रहा है, यद्यपि कारक विभक्तियों में ये सहज लग रहा है पर, अंतिम बंद के इस अंश में २१२२ (जिसका परिपालन) पूरे गीत में हुआ है 

गुणसूत्र की

वेणी पकड़ ये

किसी भी तरह से लय में नहीं आ रहा सो इस अंश में प्रवाह बाधित लग रहा है.

विशवास है अपना कहा स्पष्ट कर पायी.

शुभेच्छाएं.

Comment by Meena Pathak on December 2, 2013 at 6:44pm

बहुत सुन्दर भावपूर्ण प्रस्तुति, बधाई स्वीकारें 

Comment by राजेश 'मृदु' on December 2, 2013 at 5:14pm

आदरणीय प्राची जी, आपसे भी मेरा नम्र निवेदन यही रहेगा कि कहां-कहां और किस तरह की चूक हुई यह बता दें बड़ा आभारी रहूंगा, सादर

Comment by राजेश 'मृदु' on December 2, 2013 at 5:12pm

आदरणीय सौरभ जी, मैंनें अपनी क्षमतानुसार कथ्‍य व शिल्‍प को सहेजने का प्रयास किया है इस बारे में मैं अन्‍यमनस्‍क कतई नहीं हूं । ये जरूर कह सकते हैं कि कुछ चीजें शायद मैं समझ ही नहीं पा रहा हूं  । शिल्‍प के बारे में साफ-साफ मेरी गलतियां अगर इंगित कर दें तो बड़ी कृपा होगी, सादर

Comment by राजेश 'मृदु' on December 2, 2013 at 5:05pm

आदरणीय बृजेश नीरज जी एवं गीतिका जी, आपका आभारी हूं । आदरणीय गीतिका जी, बौख शब्‍द का अर्थ भटकना ले सकते हैं, सादर


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on December 2, 2013 at 4:50pm

वृद्धाश्रम के पृष्ठ में....

भाव की हर बांसुरी में

भर गया है कौन पारा ?...........मन को झकझोर देने वाली पंक्तियाँ 

हर बंद अप्रतिम कथ्य भाव संजोये मर्मस्पर्शी भाव चित्र प्रस्तुत करता है...

शिल्प गठन पर (अंतिम बंद में विशेषकर) कहीं कहीं रचना कमज़ोर अवश्य है  

इस अति उन्नत भाव प्रस्तुति के लिए आपको हृदय से बधाई.

Comment by विजय मिश्र on December 2, 2013 at 1:23pm
"कुछ मचलती
कामना हित
हेय घोषित
रूप को " - प्रसंशनीय संयोजन ,ये चार शब्द सबकुछ कहने में समर्थ हैं किन्तु विषय का पात्र तो धिकयोग्य भी नहीं | अश्रध्य प्रचलन जो भावनाशून्य भोगी पशुओं ने सृजित किये |बधाई मृदुजी

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on December 2, 2013 at 1:16pm

आदरणीय राजेश मृदुजी,

आपकी प्रस्तुत रचना भाव, शब्द, कथ्य, तथ्य और संप्रेषणीयता के लिहाज से न केवल मुग्धकारी है, बल्कि वैचारिकता की दृष्टि से मैं इसे आपकी कुछ अति समृद्ध रचनाओं में गिनना चाहूँगा. वृद्धाश्रम के सापेक्ष जहाँ उन्नत, मनोहारी विगत को संयत रखने का दायित्व होता है वहीं वर्तमान काल-खण्ड की निस्पृहा, या कई अर्थों में कार्मिक रूप से अशक्तता, इतनी भारी होती है कि उसे सँभालना दुरूह तो नहीं किन्तु किसी रचनाकार के लिए कठिन अवश्य होता है. आपने दोनों के मध्य स्तुत्य संतुलन बनाये रखा है, जोकि आपकी प्रौढ़ समझ का ही उत्तम परिचायक है.

इस प्रस्तुति के तीनों बंद भाव-दशा तथा भाव-संप्रेषण में समुचित सक्षम हैं तथा एक संवेदनशील पाठक से साग्रह हामी लेते हुए से हैं. जीवन के इस कालखण्ड की इतनी संवेदनशील प्रस्तुति.. ! वाह ! वाह भाईजी वाह !!

यह अवश्य है कि प्रस्तुति के प्रति शिल्प की दृष्टि से मैं कत्तई संयत नहीं हूँ. और तो और आपकी इस ओर अपनायी गयी अन्यमनस्कता के प्रति बलात ’बउख’ या ’बौख’ कर रह जाता हूँ. कई बार आपसे इस तथ्य के सापेक्ष बातें हुई हैं. कई बार आपने मेरे कहे को स्वीकारा भी है और कई बार, जैसे कि अबकी, नकार कर बेलौस आगे बढ़ते गये हैं. यह मेरे जैसे किसी वाचाल अकिंचन के प्रति आपका नज़रिया न भी हो तो मुखर रूप से अपनाया गया अनमानापन तो अवश्य है.

आपने जिस विन्यास को इस रचना का आधार माना है उसमें इतनी छूट लेना मेरे जैसे किसी पाठक को छटपटाने के क्षण अवश्य उपलब्ध करा देती है.

बहरहाल, इस अति प्रखर और भावदशा से अत्युच्च रचना को साझा करने के लिए आपको हार्दिक बधाई कह रहा हूँ, साथ ही, अनेकानेक शुभकामनाएँ प्रेषित हैं.
सादर

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