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भाव की हर बांसुरी में

भर गया है कौन पारा ?

देखता हूं

दर-बदर जब

सांझ की

उस धूप को

कुछ मचलती

कामना हित

हेय घोषित

रूप को

सोचता हूं क्‍या नहीं था

वह इन्‍हीं का चांद-तारा ?

बौखती इन

पीढि़यों के

इस घुटे

संसार पर

मोद करता

नामवर वह

कौन अपनी

हार पर

शील शारद के अरों को

ऐंठती यह कौन धारा ?

इक जरा सी

आह सुन जो

छूटता

ले प्राण था

तू ही जिनकी

जिंदगी था

तू ही जिनकी

जान था

चाहते थे वे रथी कब

सारी धरती व्‍योम सारा ?

देवता वो

कौन है जो

हर सके

इस पाप को

गुणसूत्र की

वेणी पकड़ ये

लीलते बस

'आप' को

स्‍वार्थ की ताबीज ताने

किसने है ये मंत्र मारा ?

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

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Comment

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Comment by वेदिका on December 2, 2013 at 12:44pm

रचना बहुत भावभीनी हुयी है| मुझे कहीं कहीं कठिन अवश्य लगी है| //बौखती// शब्द का तात्पर्य नही समझ सकी हूँ! 

रचना पर हार्दिक बधाई!!

Comment by बृजेश नीरज on December 2, 2013 at 12:35pm

वाह! लाजवाब! तीसरा कोई और शब्द कह पाने की स्थिति में नहीं हूँ!

आपको हार्दिक बधाई!

Comment by राजेश 'मृदु' on December 2, 2013 at 11:27am

//प्राण और जान दोनों के प्रयोग एक साथ दोनों में भिन्नता क्या है भाई जी//

आदरणीय अरून शर्मा 'अनन्‍त' जी इस रचना में मैंने प्राण को समस्‍त चैतन्‍य ऊर्जा के प्रतीक के रूप में ग्रहण किया है जो अमूर्त है, स्‍पंदन का उत्‍स है जबकि जान इसी ऊर्जा की पार्थिव अभिव्‍यक्ति है, प्राण जहां प्रेरक है वहीं प्रेरणा भी, सादर

Comment by राजेश 'मृदु' on December 2, 2013 at 11:22am

//कही- कही मै आपकी कल्पना को पकड़ नहीं सका वह मेरा अज्ञान है // श्रद्धेय, डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव जी, कहीं कुछ त्रुटि या अस्‍पष्‍टता हो तो अवश्‍य साझा करें ताकि आगे की रचनाओं में संप्रेषणीयता स्‍पष्‍ट हो, सादर

Comment by राजेश 'मृदु' on December 2, 2013 at 11:19am

आप सबका हार्दिक आभार

Comment by आशीष यादव on December 1, 2013 at 6:52pm
सुन्दर रचना। बधाई स्वीकारेँ।
Comment by Sushil Sarna on December 1, 2013 at 4:49pm

aa.Rajesh jee gahan bhaav liye is sundr rachna ke prastutikaran ke liye haardik badhaaee

Comment by अरुन 'अनन्त' on December 1, 2013 at 12:51pm

आदरणीय बहुत ही सुन्दर गीत रचा हैं आपने, किन्तु मुझे इन पंक्तियों में तनिक भ्रम हो रहा है.

इक जरा सी

आह सुन जो

छूटता

ले प्राण था

तू ही जिनकी

जिंदगी था

तू ही जिनकी

जान था ... (प्राण और जान दोनों के प्रयोग एक साथ दोनों में भिन्नता क्या है भाई जी)

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on December 1, 2013 at 11:09am

आप तो पारा पिघला के बहा रहे हैं

ग़ज़ब का गीत आदरणीय

बधाई स्वीकार करें जय हो


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on December 1, 2013 at 6:57am

आदरणीय राजेश मृदु भाई , सुन्दर गीत रचना के लिये आपको बधाई !!!!

कृपया ध्यान दे...

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