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माँ जैसी प्यारी है मौत (गीत) अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव

ज़िन्दगी तू मौत से  पीछा छुड़ा न पाएगी।                                                                  

उम्र  बढ़ती जाएगी , करीब  आती जाएगी।।                                                                             

     

ज़िन्दगी सफर है और, मुक्ति है मंजि़ल तेरी।                                                                   

मुक्ति जब करीब हो, तो  मौत मुस्कराएगी।।                                                                          

 

मौत एक माँ की तरह, फर्ज़ भी निभाएगी।                                                             

प्यार भरी थपकियों से,  गोद में सुलाएगी।।                                                                                           

 

जब मधुर आवाज़ में, वो लोरी गुनगुनाएगी।                                                               

नींद गहरी और गहरी, और  होती जाएगी।।                                                                           

     

माँ को सबका ध्यान है, सभी पे मेहरबान है।            

मुक्ति सारी झंझटों से, मौत ही  दिलाएगी।।                                            

 

भेद भाव करती नहीं, सब को चाहती है माँ।                           

जब समय आ जाएगा, बिना बुलाए आएगी।।                                            

 

हर जनम  में माँ , तू एक बार  मिलती है।               

स्वागत् है इस जनम में, तू कभी तो आएगी।।

********************************

-  अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव, धमतरी (छत्तीसगढ़)

 

( मौलिक एवं अप्रकाशित )   

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Comment by अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव on March 22, 2014 at 1:02pm

आदरणीय जितेन्द्र भाई

आपकी टिप्पणी पर मैं ध्यान नहीं दे पाया था, देर से ही सही रचना की हृदय से प्रशंसा के लिए हार्दिक धन्यवाद ।

Comment by अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव on March 22, 2014 at 1:01pm

आदरणीय शिज्जु भाई

आपकी टिप्पणी पर मैं ध्यान नहीं दे पाया था, देर से ही सही रचना की हृदय से प्रशंसा के लिए हार्दिक धन्यवाद ।

Comment by अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव on January 3, 2014 at 9:43pm

विजिश  भाई, हार्दिक धन्यवाद  इस रचना को दिल से पसंद करने के लिए

Comment by M Vijish kumar on January 2, 2014 at 2:52pm

बहुत खूब आदरणीय  अखिलेश जी। 

Comment by अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव on December 19, 2013 at 1:46pm

सौरभ भाई, मृत्यु के प्रति हर किसी के मन में एक अज्ञात भय रहता है इसे ही दूर करने और  कुछ अलग लिखने का प्रयास किया है। आपकी और सभी पाठकों की प्रतिक्रिया उत्साहवर्धक है। हार्दिक धन्यवाद सौरभ भाई, आपकी बेबाक टिप्पणी और सुझावों का इंतजार हर समय हर किसी को रहता है ताकि आगे कुछ अच्छा लिखा जा सके॥


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on December 8, 2013 at 1:51am

एक सनातन सत्य को आपने अपने ढंग से गुनगुनाने का प्रयास किया है. आदरणीय अखिलेशजी. आपने माँ का स्वरूप दे कर अंतिम सत्य को सरस बना डाला है. रचना के कथ्य के प्रति बधाई और हार्दिक शुभकामनाएँ

शुभ-शुभ

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on December 6, 2013 at 9:48am

आपकी रचना पूर्णत: नकारात्मक विचार को सकारात्मकता की ओर प्रवाहित करती है,एक अटूट सत्य ली हुयी सुंदर भाव समाहित पंक्तियों पर बधाई स्वीकारें आदरणीय अखिलेश जी

Comment by विजय मिश्र on December 4, 2013 at 10:37am
ऐसा नहीं है अखिलेशजी ,इसका पैटर्न / बुनावट किसी संत -सूफी के फलसफे जैसी है . कहाँ ज्यादा कहा हमने ?

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on December 3, 2013 at 11:54pm

वाह आदरणीय अखिलेश सर मैं निशब्द हो गया हूँ, हम चाहें तो नकारात्मक चीज़ों से भी सकारात्मक कुछ सीख सकते हैं बधाई आपको

Comment by अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव on December 3, 2013 at 10:26pm

 इस रचना को  पसंद करने के लिए हार्दिक धन्यवाद आ. गीतिकाजी 

कृपया ध्यान दे...

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