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चार मुक्तक
1.
झुकाना पड़े सिर मां को ऐसा कारोबार मत कीजिये,
अपने लहू से जिसने पाला उसे लाचार मत कीजिये,
कर सको तो करो ऐसा काम जगत में कि गर्व हो तुम पर,
कोख मां की हो जाये लज्जित ऐसा व्यवहार मत कीजिये,

2.
बरस बीत जाते है किसी के दिल में जगह पाने में,
एक गलत फहमी देर नहीं लगाती साथ छुड़ाने में,
बहुत नाजुक होती है मानवीय रिश्तों की डोर यहां,
नफरत में देर नहीं लगाते लोग पत्थर उठाने में।

3.
हर बात की अपनी करामात होती है,
कभी ये हंसाती तो कभी रुलाती है,
बात कीजिये हमेशा संभल संभल कर,
चुभ जाये तो ये घाव गहरा करती है।

4.
भरी हो जेबें तो जगमग दिवाली सी लगती है जिन्दगी,
पैसा न हो पास तो खाली खाली सी लगती है जिन्दगी,
भूख और बदहाली का जीवन भी कोई जीवन है भला,
जीवन में मिले प्यार तो मस्त प्याली सी लगती है जिन्दगी।
- दयाराम मेठानी
(मौलिक / अप्रकाशित)

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Comment by Dr Ashutosh Mishra on December 5, 2013 at 8:57am

हर बात की अपनी करामात होती है,
कभी ये हंसाती तो कभी रुलाती है, 
बात कीजिये हमेशा संभल संभल कर,
चुभ जाये तो ये घाव गहरा करती है।.....शानदार मुक्तक ..ढेरों बधाई स्वीकार करें 

Comment by ram shiromani pathak on December 5, 2013 at 12:32am

 सुन्दर  मुक्तक !!!!हार्दिक बधाई.

Comment by अरुन शर्मा 'अनन्त' on December 4, 2013 at 2:19pm

आदरणीय दयाराम सर बढ़िया मुक्तक हैं बधाई स्वीकारें

Comment by Dayaram Methani on December 4, 2013 at 2:06pm

आदरणीय विजय मिश्र जी, शिज्जू शकूर जी, केडिया चिराग जी एवं गिरिराज भंडारी जीं आप सबकी टिप्पणी से प्रोत्साहन मिला। बहुत बहुत धन्यवाद एवं आभार।

- दयाराम मेठानी

Comment by विजय मिश्र on December 4, 2013 at 12:42pm
"कर सको तो करो ऐसा काम जगत में कि गर्व हो तुम पर,
कोख मां की हो जाये लज्जित ऐसा व्यवहार मत कीजिये, "
-- ये पंक्तियाँ मुझे बहुत खास लगीं , पूरी रचना बहुत सीख भरी है और आज के परिप्रेक्ष्य में अनिवार्य है इन सोचों का प्रस्फुटन | साधुवाद दयारामजी

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on December 3, 2013 at 11:24pm

//बरस बीत जाते है किसी के दिल में जगह पाने में,
एक गलत फहमी देर नहीं लगाती साथ छुड़ाने में,
बहुत नाजुक होती है मानवीय रिश्तों की डोर यहां,
नफरत में देर नहीं लगाते लोग पत्थर उठाने में।// बहुत बढ़िया आदरणीय दयाराम सर सार्थक मुक्तक है

Comment by Kedia Chhirag on December 3, 2013 at 4:12pm

लाजबाब ..लाजबाब ...ऐसी अद्भुत रचनायें नए कवियों को हमेशा लिखने को प्रेरित करेंगी .....


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on December 3, 2013 at 2:04pm

आदरणीय दयाराम भाई , सुन्दर , सार्थक मुक्तक के लिये आपको बधाई !!!!

कृपया ध्यान दे...

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