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बेहतरीन ग़ज़ल के लिए बधाईयाँ..............
छुपाते हैं जिसे दिल में उसे ही छीन लेता है,
न जाने कौन क़ातिल है हमारे राज़दारों में।
वाह, वाह, वाह !!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!
ravi prakash ji achhi gazal hai matle ke lie mubark bad
आदरणीय रविप्रकाश भाई वाह बहुत खूबसूरत अशआर हुए हैं इस सुन्दर उम्दा ग़ज़ल के लिए दिली दाद कुबूल फरमाएं.
क्या बात है आदरणीय जोरदार ग़ज़ल कही है आपने दिली दाद हाजिर है
बहुत बढ़िया भाई रविप्रकाश जी बेहतरीन ग़ज़ल है दाद कुबूल फरमायें
न मुड़ के देखती है फिर लहर जो लौट जाती है,
बड़ी गहरी उदासी है समंदर के किनारों में।...........क्या बात है.
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