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ग़ज़ल : सच है यही कि स्वर्ग न जाती हैं सीढ़ियाँ

बह्र : २२१२ १२११ २२१२ १२

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सच है यही कि स्वर्ग न जाती हैं सीढ़ियाँ

मैं उम्र भर चढ़ा हूँ पर बाकी हैं सीढ़ियाँ

 

तन के चढ़ो तो पल में गिराती हैं सीढ़ियाँ

झुक लो जरा तो सर पे बिठाती हैं सीढ़ियाँ

 

चढ़ते समय जो सिर्फ़ गगन देखता रहे

जल्दी उसे जमीन पे लाती हैं सीढ़ियाँ

 

मत भूलिये इन्हें भले आदत हो लिफ़्ट की

लगने पे आग जान बचाती हैं सीढ़ियाँ

 

रहना अगर है होश में चढ़ना सँभाल के

हर पग पे एक पैग पिलाती हैं सीढ़ियाँ

-------

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

Views: 715

Comment

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Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on December 7, 2013 at 11:27pm

बहुत बहुत धन्यवाद  arun kumar nigam जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on December 7, 2013 at 11:27pm

तह-ए-दिल से शुक्रगुज़ार हूँ गिरिराज भंडारी जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on December 7, 2013 at 11:27pm

बहुत बहुत धन्यवाद  SANDEEP KUMAR PATE जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on December 7, 2013 at 11:26pm

बहुत बहुत धन्यवाद Shyam Narain Verma जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on December 7, 2013 at 11:26pm

बहुत बहुत शुक्रिया Sarita Bhatia जी

Comment by savitamishra on December 7, 2013 at 6:37pm

बहुत सुन्दर

Comment by अरुन 'अनन्त' on December 7, 2013 at 5:15pm

बहुत ही खूबसूरत ग़ज़ल आदरणीय बधाई आपको

Comment by Meena Pathak on December 7, 2013 at 2:19pm

बहुत सुन्दर गज़ल | बधाई आप को 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on December 6, 2013 at 10:46pm

रदीफ़ के लिए बधाई ... एक प्रैक्टिकल रचना है ..अनुभव और सूक्ष्म अध्ययन .. चीज़ों को बारीकी से देख कर उपजी ग़ज़ल ... बधाई  
मतले में पर (सानी) में १ मात्रिक नहीं है ...
शेष रचना बहुत उम्दा है ....
बधाई आप को  


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by अरुण कुमार निगम on December 6, 2013 at 9:37pm

आदरणीय धर्मेन्द्र जी, हमेशा की तरह एक और लाजवाब ग़ज़ल.............वाह क्या बात है..........

कृपया ध्यान दे...

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