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"अंकल, इस बार सामान के बिल में सौ-दो सौ रूपये जरा बढाकर लिख देना, आगे मैं समझ लूँगा"  रोहन ने दुकानदार से कहा.

"ऐसा ?.. पर बेटा, यह तो तुम्हारे घर की ही लिस्ट है न ?" दुकानदार को बहुत आश्चर्य हुआ.

"हाँ है तो. पर क्या है कि पापा आजकल पॉकेटमनी देने में बहुत आना-कानी करने लगे हैं.. " रोहन ने अपनी परेशानी बतायी.

(संशोधित)

जितेन्द्र ' गीत '

( मौलिक व् अप्रकाशित )

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Comment by ram shiromani pathak on December 20, 2013 at 9:50am

सुन्दर परिश्रम सार्थक हुआ है। ……लिखते रहे  आदरणीय जीतेन्द्र  जी। ....... हार्दिक बधाई आपको। ।शुभ शुभ 

Comment by annapurna bajpai on December 19, 2013 at 2:30pm

सुंदर लघु कथा , आ० जितेंद्र जी । 

Comment by AVINASH S BAGDE on December 19, 2013 at 10:48am

घर ही भ्रष्टाचार की  प्रथम प्रयोगशाला /उम्दा जितेन्द भाई 

Comment by vandana on December 19, 2013 at 6:34am

बहुत अच्छी तरह संशोधन किया आपने आदरणीय जितेन्द्र जी ....हार्दिक बधाई 

Comment by CHANDRA SHEKHAR PANDEY on December 19, 2013 at 12:10am

लघुकथा ने मंटो की छोटी और मारक लघुकथाओं की याद दिलादी। जय हो।

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 18, 2013 at 7:11pm

गीत जी

इसे पढ़ चुका था i पर आपने जो संशोधन  किये उससे यह  रचना जीवंत होकर सर्वथा  नवीन  हो गयी i आपको साधुवाद i


प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on December 18, 2013 at 1:14pm

भाई जितेन्द्र जी, सब से पहले तो आपके सीखने के जज़बे को सलाम कहता हूँ. दोस्तों और शुभचिंतकों की राय का सम्मान करते हुए जिस तरह बार बार इसमें सुधार किया है वह वंदनीय है. अब आपकी लघुकथा काफी उभर कर सामने आई है, हार्दिक बधाई स्वीकारें।

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on December 18, 2013 at 1:10pm

आदरणीय योगराज जी

आपका स्नेहिल मार्गदर्शन पाकर व् आपके द्वारा रचना पर बताये गये,  विस्तृत  बिन्दुओ को ध्यान में रखकर, मैंने उक्त घटना को एक लघुकथा बनाने का पूर्ण प्रयास किया है, आपके मार्गदर्शन की आवश्यकता हमेशा रहेगी.

सादर! 


प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on December 18, 2013 at 12:16pm

//hhhhhhhhh//

सविता मिश्रा जी, यह किस प्रकार की टिप्प्णी है ?

Comment by savitamishra on December 18, 2013 at 12:06pm

hhhhhhhhh

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