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ग़ज़ल - (रवि प्रकाश)

बहर-ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ (8 गुरु)
.
गलियों-गलियों गाना भी है।
रस्ते में मैख़ाना भी है॥
.
नफ़रत की मारामारी में,
चाहत का पैमाना भी है।
.
अपनी कुटिया के पीछे ही,
उनका दौलतख़ाना भी है।
.
लाखों हैं कनबतियाँ लेकिन,
नैनों का टकराना भी है।
.
दोपहरें अलसाएँ तो क्या,
भोरों का इठलाना भी है।
.
कितने बल हैं पेशानी पर,
परियों का शरमाना भी है।
.
झूठों की हाँडी के नीचे,
सच का आतिशख़ाना भी है।
.
आने वाले कल का दुखड़ा,
इस पल का इतराना भी है।
.
ग़ैरों की रेलमपेलों में,
इक जाना-पहचाना भी है।
.
घुँघरू बाँधे मीरा नाचे,
काशी का मस्ताना भी है।
.
अंधों-कानों की नगरी में,
नज़रों का नज़राना भी है।
.
चमकीले पुतलों के पीछे,
जोगी वाला बाना भी है।
.
दिन की बातें कहते-सुनते,
साँझों में घर जाना भी है॥
.
-मौलिक व अप्रकाशित।
-06.12.2013

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Comment

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Comment by Tapan Dubey on December 10, 2013 at 6:43pm
आदरणीय रवि जी सुंदर गजल के लिए बधाई
Comment by Ravi Prakash on December 10, 2013 at 4:53pm
सराहना तथा उत्साहवर्धन के लिए हार्दिक धन्यवाद आ॰ निलेश जी।
Comment by Nilesh Shevgaonkar on December 10, 2013 at 2:06pm

सुन्दर गज़ल के लिये हार्दिक बधाई

Comment by Ravi Prakash on December 9, 2013 at 9:40pm
धन्यवाद।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on December 9, 2013 at 8:53pm

आदरणीय रविप्रकाश जी , सुन्दर गज़ल के लिये हार्दिक बधा

Comment by Ravi Prakash on December 9, 2013 at 5:40pm
धन्यवाद आ॰ मीना जी।
Comment by Ravi Prakash on December 9, 2013 at 5:38pm
ज़र्रानवाज़ी के लिए शुक्रिया आ॰ भंडारी जी।
Comment by Meena Pathak on December 9, 2013 at 5:27pm

बहुत सुन्दर गज़ल , बधाई आप को 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on December 9, 2013 at 4:42pm

आदरणीय , सुन्दर गज़ल के लिये हार्दिक बधाई !!!!

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